ग़ाज़ी-ए-मिल्लत, फ़ख़्र-ए-क़ौम
मोहतरम अब्दुल क़यूम अंसारी साहब (1905–1973)
एक युग, एक विचार, एक आंदोलन
मोहतरम अब्दुल क़यूम अंसारी साहब (1 जुलाई 1905 – 18 जनवरी 1973) भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक न्याय के इतिहास में एक ऐसे दुर्लभ व्यक्तित्व थे, जिनकी ज़िंदगी सत्ता या पद की नहीं, बल्कि विचार, संघर्ष और समानता की जीवंत मिसाल थी। वे न केवल अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ डटकर खड़े हुए, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी सामाजिक अन्याय, सांप्रदायिक राजनीति और मुस्लिम समाज के भीतर व्याप्त अशराफ़ी वर्चस्व को चुनौती देते रहे।
वे पसमांदा तहरीक के संस्थापक-प्रेरक, राष्ट्रीय एकता के सशक्त हिमायती और धर्मनिरपेक्ष भारत के सच्चे सिपाही थे। उनके व्यक्तित्व में राष्ट्रवाद, समाज सुधार और मानवीय संवेदना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में उनकी जयंती पर डाक टिकट जारी किया जाना उनके राष्ट्रीय योगदान की आधिकारिक स्वीकृति है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
अब्दुल क़यूम अंसारी साहब का जन्म 1 जुलाई 1905 को बिहार के डेहरी-ऑन-सोन (तत्कालीन शाहाबाद जिला, वर्तमान रोहतास) में एक प्रतिष्ठित अंसारी (मोमिन/जुलाहा) परिवार में हुआ। उनका परिवार शिक्षित, सामाजिक रूप से जागरूक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ था, जिसने बचपन से ही उनके भीतर शिक्षा और समाज-सेवा के संस्कार विकसित किए।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा सासाराम और डेहरी-ऑन-सोन में प्राप्त की। आगे चलकर वे उच्च शिक्षा के लिए
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी,
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कोलकाता यूनिवर्सिटी तथा
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इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से जुड़े।
हालाँकि, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और बार-बार जेल जाने के कारण उनकी औपचारिक डिग्री पूरी नहीं हो सकी, लेकिन शिक्षा के प्रति उनकी आस्था कभी कम नहीं हुई। उनका स्पष्ट मत था कि
“तालीम ही वह सबसे बड़ा हथियार है, जिससे पसमांदा समाज अशराफ़ी वर्चस्व और सामाजिक भेदभाव को तोड़ सकता है।”
वे जीवन भर पसमांदा समाज में शैक्षिक चेतना फैलाने के लिए संघर्षरत रहे।
स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका
अंसारी साहब में देशभक्ति की भावना बहुत कम उम्र में ही जागृत हो चुकी थी।
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मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्होंने इलाहाबाद की लीडर्स कॉन्फ़्रेंस और कोलकाता में ऑल इंडिया कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया।
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16 वर्ष की उम्र में असहयोग आंदोलन और खिलाफ़त आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें गिरफ़्तार किया गया।
जेल से रिहाई के बाद उन्होंने इलाहाबाद स्थित आनंद भवन में पंडित जवाहरलाल नेहरू से मुलाक़ात कर एक छह-सूत्रीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जिसमें देश के लगभग 60 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिमों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान की माँग शामिल थी।
1928 में वे औपचारिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े।
उन्होंने कांग्रेस के छात्र आंदोलनों में भाग लिया, साइमन कमीशन का विरोध किया और “साइमन गो बैक” आंदोलन में फिर से जेल गए। यह स्पष्ट करता है कि उनकी राजनीति मज़हबी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और जनपक्षधर थी।
पसमांदा तहरीक और मुस्लिम लीग का वैचारिक विरोध
1930 के दशक में अब्दुल क़यूम अंसारी साहब ने ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ़्रेंस को एक मज़बूत सामाजिक और राजनीतिक मंच में परिवर्तित किया और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।
उन्होंने मुस्लिम लीग की राजनीति को पसमांदा समाज के लिए घातक बताया। उनका मानना था कि दो-राष्ट्र सिद्धांत दरअसल अशराफ़ नेतृत्व की वह साज़िश है, जिसमें गरीब और पिछड़े मुसलमानों को मोहरा बनाया जा रहा है। वे भारत के विभाजन के प्रबल विरोधी थे और मानते थे कि धर्म के आधार पर देश का बँटवारा सबसे अधिक नुकसान गरीब तबकों को पहुँचाएगा।
1946 का ऐतिहासिक चुनाव
1946 के आम चुनावों में उन्होंने मोमिन कॉन्फ़्रेंस के उम्मीदवारों को मुस्लिम लीग के विरुद्ध मैदान में उतारा।
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बिहार में 6 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज हुई।
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इसके साथ ही वे बिहार के पहले पसमांदा मुस्लिम कैबिनेट मंत्री बने और बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल हुए।
यह जीत इस बात का प्रमाण थी कि मुस्लिम लीग पूरे मुस्लिम समाज की प्रतिनिधि नहीं थी।
आज़ादी के बाद राष्ट्र निर्माण में भूमिका
स्वतंत्रता के बाद भी उनकी राष्ट्रनिष्ठा उतनी ही प्रखर रही।
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अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर किए गए हमले की उन्होंने खुलकर निंदा की।
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वे पहले मुस्लिम नेताओं में थे जिन्होंने इस आक्रमण के खिलाफ़ सार्वजनिक रूप से आवाज़ उठाई।
1948 में हैदराबाद में रजाकारों की बगावत के दौरान उन्होंने भारत सरकार का समर्थन किया। 1957 में उन्होंने इंडियन मुस्लिम यूथ कश्मीर फ्रंट की स्थापना की।
वे लगभग 17 वर्षों तक बिहार सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। एक समय उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा भी चली, लेकिन अशराफ़ लॉबी के विरोध के कारण यह संभव न हो सका। फिर भी उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
सामाजिक न्याय की लड़ाई
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पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) के गठन में उनकी भूमिका अहम रही।
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बुनकरों, किसानों, मज़दूरों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए वे जीवन भर संघर्ष करते रहे।
मृत्यु और अमर विरासत
18 जनवरी 1973 को 67 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। वे बिहार के अमियावर गाँव में बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत कार्य का निरीक्षण कर रहे थे। जनता की सेवा करते हुए उनका जीवन समाप्त हुआ—यानी वे आख़िरी सांस तक जनता के साथ और जनता के लिए खड़े रहे।
अब्दुल क़यूम अंसारी साहब केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि
राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय और पसमांदा उत्थान की एक जीवंत विचारधारा थे।
आज जब पसमांदा विमर्श फिर से मजबूती पकड़ रहा है, तब उनका जीवन और संघर्ष हमें सही दिशा दिखाता है।
“मौत उसकी है करे जिसका ज़माना अफ़सोस,
यूँ तो आए हैं सभी दुनिया से जाने के लिए।”
अल्लाह तआला उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए। आमीन।
— मुहम्मद युनुस
CEO, ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़

