महत्वपूर्ण विषय ये है कि मुस्लिम समाज विज्ञान से क्यों दूर है, उसे विज्ञान में कोई दिलचस्पी नहीं है या वह विज्ञान को दीन के लिए ख़तरा मान कर उससे दूरी बनाए हुए है.. हर तकनीक के दो पहलू होते हैं पहला उसका सही उपयोग कर के मानव जाति को फ़ायदा पहुंचाया जाए. दूसरा उसका ग़लत उपयोग कर मानव जाति को नुकसान पहुंचाया जाए.. इस्लाम मानव जाति के परोपकार की शिक्षा देता है न कि विनाश की.. लिहाज़ा अगर मुस्लिम समाज अपने दीन के साथ साथ विज्ञान को भी मजबूती से थाम ले तो यह अपने समुदाय के विकास के साथ साथ देश और दुनियां के विकास में भी सहायक हो सकता है.. तालीमी बेदारी मिशन अलीगढ़ भी इसी सोच पर काम करने की योजना रखता है. हमारा मानना है कि बच्चे की 10 -12 साल की उम्र तक़ स्कूली शिक्षा के साथ साथ दीनी तालीम पर ज़्यादा फोकस करना चाहिए उसके बाद 13 -से 18 साल की उम्र में बच्चों का पूरा फोकस अपनी स्कूल की पढ़ाई पर रहना चाहिए.. क्लास 9th से क्लास 12th तक की तालीम तय करती है कि हमारा समाज किस ओर आगे बढ़ रहा है.. 18 – से 24 की उम्र में यह तय हो जाता है कि आप कहां खड़े हैं…. लोग आपको रास्ता बता सकते हैं वो नितिन गडकरी जी हो या कोई और, रास्ते पर आगे आपको ही चलना है अकेले… अब तय आपको करना है कि नमाज़ के साथ साथ विज्ञान पढ़ कर आगे बढ़ कर मुस्लिम समाज को एक नई पहचान तक ले जाना है। या संसाधनों की कमी, अपनी किस्मत का रोना रो कर हाथ में प्लास और पेचकश पकड़ कर पंचर वाला अब्दुल बन कर पूरी कौम को पंक्चर लगाने वाली कौम का नाम देना है….