“अगर आप 6 घंटे पढ़ाई नहीं कर सकते, तो 12 घंटे मज़दूरी के लिए तैयार रहिए।” यह जुमला सिर्फ़ कोई नारा नहीं है—बल्कि ज़िन्दगी की सख़्त हक़ीक़त है। मैं चाहता हूँ कि हर पसमान्दा मुसलमान बच्चा इसको दिल में उतारे। इस दौर में जहाँ कामयाबी की असल कुंजी ज्ञान और जानकारी है, वहाँ शिक्षा हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत है।
मेरे भाइयों और बहनों, आपके माँ-बाप भले मज़दूरी करते हों, कपड़े सीते हों, बाल काटते हों या बर्तन माँजते हों—लेकिन आप सिर्फ़ उसी तक़दीर के लिए पैदा नहीं हुए। आप पढ़ने के लिए, आगे बढ़ने के लिए, और अपनी क़ौम को उठाने के लिए पैदा हुए हैं।
सोचिए, अंधेरे गाँव की। फिर सोचिए उसी गाँव का एक बच्चा पढ़ाई करता है—विज्ञान, गणित, इतिहास सीखता है। वही बच्चा अपने गाँव में रोशनी लाता है, सोलर पैनल बनाता है, सिविल सर्विस की तैयारी करता है, और सबकी ज़िन्दगी बदल देता है।
शिक्षा में ताक़त है—यह दर्ज़ी के बेटे को डिज़ाइनर बनाती है, रिक्शा खींचने वाले के बेटे को रिसर्चर। यही चाबी है जो जाति और भेदभाव से बंद दरवाज़ों को खोलती है।
> “आलिम की स्याही शहीद के ख़ून से ज़्यादा पाक़ है।” — हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.)
इस्लाम ने हमें पिछड़े रहने का हुक्म कभी नहीं दिया। उसने कहा“इक़रा”पढ़ो! यही पहला इल्हाम था। यानी पढ़ाई इबादत है।
मैं आपको सच्चाई बताता हूँ: जो बच्चा 13 साल में स्कूल छोड़ देता है, वही कारख़ाने में, खेतों में, चाय की दुकान पर या रिक्शा खींचते हुए दिखता है। वहाँ न नौकरी की गारंटी है, न सेहत की। बस थकान और बेबसी।
दूसरा रास्ता भी है:
अगर आप पढ़ते हैं, इम्तिहान पास करते हैं, कॉलेज जाते हैं या हुनर सीखते हैं—तो आप नर्स, टीचर, कंप्यूटर टेक्नीशियन, अफ़सर बन सकते हैं। आप इज़्ज़त से कमाएँगे और पूरे परिवार को रोशन करेंगे।
अंसारी, कुरैशी, मंसूरी, सैफ़ी, धोबी, जुलाहे—हमारी बस्तियों में स्कूल बदहाल हैं, हमें नौकरियों में अनदेखा किया जाता है। लेकिन यही जगह से हमें बदलाव शुरू करना है।
शिक्षा सिर्फ़ दुनियावी ज़रूरत नहीं—यह अल्लाह का हुक्म भी है। रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने कहा:
“इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है।”
जब एक पसमान्दा बच्चा डॉक्टर बनता है, तो सौ और बच्चों को हिम्मत मिलती है। जब एक लड़की प्रोफ़ेसर बनती है, तो पूरी बस्ती का आत्मविश्वास बढ़ता है।
हम ऐसे दौर में हैं जहाँ आने वाली नौकरियाँ मज़दूरी में नहीं—बल्कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी, हेल्थ और एजुकेशन में होंगी। अगर आज आप नहीं पढ़ेंगे, तो पीछे रह जाएँगे। लेकिन अगर पढ़ेंगे—तो दुनिया की अगुवाई करेंगे।
तो पढ़ाई को अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाइए।
इसे 2-2 घंटे के हिस्सों में बाँट लें।
मोबाइल गेम्स और बेकार यूट्यूब से बचें।
घर का एक कोना भी आपका स्कूल बन सकता है।
रोज़ाना दोहराएँ—समझकर पढ़ें।
अल्लाह से इल्म और हिकमत की दुआ माँगें।
और छोटे बच्चों को पढ़ाएँ—इससे आपका भी इल्म मजबूत होगा।
इसके लिए मदद के रास्ते भी हैं:
NMMS स्कॉलरशिप – आठवीं क्लास के बाद।
डिजिटल ऐप्स – दीक्षा, खान एकेडमी, बायजूस।
लाइब्रेरी और एनजीओ – मदरसा लाइब्रेरी, मुफ़्त कोचिंग सेंटर, और कई संस्थाएँ।
भाईयों और बहनों, आप छोटे पैदा नहीं हुए हैं। आप सपने देखने, आगे बढ़ने और बदलने के लिए पैदा हुए हैं।
> “बेशक, हर मुश्किल के साथ आसानी है।” — क़ुरआन 94:6
“ऐ मेरे रब! मेरे इल्म में इज़ाफ़ा कर।” — क़ुरआन 20:114
किसी को मत सुनो जो कहे कि तुम कमतर हो। आप क़ाबिल हो, आप ही भविष्य हो।
तो किताबें उठाओ, अपने कमरे को रोशनी से भर दो, और अपनी कॉपियों में सपने लिखो।
क्योंकि अगर आप आज 6 घंटे पढ़ाई करोगे, तो कल 12 घंटे मज़दूरी नहीं करनी पड़ेगी।
आमीन।
अल्लाह आपको दोनों जहानों में कामयाबी दे।
पढ़ो, बढ़ो और अपनी क़ौम को रोशन करो।
शारिक अदीब अंसारी
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष,
ऑल इंडिया पसमान्दा मुस्लिम महाज़

