SC दर्जा-धर्मांतरण-पसमांदा: कोर्ट फैसले पर तथाकथित मुस्लिम ठेकेदारों की चुप्पी क्यों?

कांग्रेस के कार्यकाल में पसमांदा समाज के साथ हुआ दोहरा अन्याय

कांग्रेस पार्टी के शासनकाल का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें सामाजिक न्याय के नाम पर कई वादे किए गए, लेकिन पसमांदा मुसलमानों (अजलाफ और अरजल वर्ग) के साथ लगातार उपेक्षा का रवैया अपनाया गया। 26 जनवरी 1950 को लागू भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। प्रारंभ में कुछ दलित मुस्लिम जातियों (जैसे अंसारी, कुरैशी, धोबी आदि) को भी इस लाभ का हकदार माना जा रहा था, क्योंकि वे ऐतिहासिक रूप से जातिगत उत्पीड़न और छुआछूत का शिकार थे।

लेकिन मात्र कुछ महीनों बाद, 10 अगस्त 1950 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, हुमायूं कबीर, मौलाना हिफ़्ज़ुर्रहमान और बेगम एजाज़ रसूल जैसे प्रमुख मुस्लिम नेताओं के परामर्श पर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा एक आदेश जारी किया गया। इस आदेश ने धार्मिक आधार पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा और संबंधित आरक्षण से वंचित कर दिया गया।
इसके बाद से पसमांदा समाज लगातार अनुच्छेद 341 से धार्मिक पाबंदी हटाने की मांग करता रहा, लेकिन कांग्रेस ने इस पर कभी गंभीर ध्यान नहीं दिया। यह फैसला न केवल संवैधानिक था, बल्कि कांग्रेस शासन में मुस्लिम समाज के भीतर अशराफ वर्चस्व को मजबूत करने वाला भी साबित हुआ।

हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसला और उजागर हुआ ऐतिहासिक अन्याय

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के 24 मार्च 2026 के फैसले ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक अन्याय को उजागर कर दिया है, जो दशकों से पसमांदा समाज झेलता आ रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक सीमित रहेगा, और अन्य धर्म (जैसे इस्लाम या ईसाई) अपनाने पर यह दर्जा समाप्त हो जाएगा। लेकिन इस फैसले से भी बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर यह स्थिति बनी कैसे? और इसमें मुस्लिम नेतृत्व तथा कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका क्या रही?

1950: जब फैसला हुआ, तब कौन चुप था?
जब संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 लागू हुआ और अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों की परिभाषा तय की गई, उसी समय इसमें धार्मिक प्रतिबंध जोड़ दिया गया। यह वह समय था जब संविधान सभा में देश के बड़े मुस्लिम नेता मौजूद थे, जिनमें प्रमुख नाम मौलाना अबुल कलाम आजाद शामिल थे।

सवाल उठता है—
– जब यह प्रतिबंध लगाया जा रहा था, तब मुस्लिम नेतृत्व ने इसका मजबूती से विरोध क्यों नहीं किया?
– क्यों पसमांदा मुसलमानों के भविष्य से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर सामूहिक आवाज़ नहीं उठी?

कई ऐतिहासिक विश्लेषण यह संकेत देते हैं कि उस समय मुस्लिम नेतृत्व का बड़ा हिस्सा अशराफ (सैय्यद, शेख, पठान) वर्ग से आता था, जिनका सामाजिक ढांचा जातिगत उत्पीड़न से सीधे प्रभावित नहीं था। कांग्रेस के नेतृत्व में भी इसी वर्ग का प्रभाव प्रमुख था, जिसने पसमांदा मुद्दों को हाशिए पर रख दिया।

अशराफ नेतृत्व और पसमांदा उपेक्षा
भारत में मुस्लिम समाज एकसमान नहीं है। इसमें स्पष्ट सामाजिक विभाजन है—
– अशराफ (उच्चवर्गीय, वंश आधारित श्रेष्ठता का दावा) – अजलाफ और अरज़ल (पसमांदा) (श्रमजीवी और ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्ग)
समस्या यह रही कि मुख्यधारा मुस्लिम नेतृत्व हमेशा अशराफ वर्ग के हाथों में केंद्रित रहा। कांग्रेस के कार्यकाल में भी यही स्थिति बनी रही। इसका परिणाम यह हुआ कि:
– पसमांदा मुसलमानों के मुद्दे कभी प्राथमिकता नहीं बने
– जातिगत भेदभाव को “इस्लाम में नहीं है” कहकर व्यवहारिक वास्तविकता से नज़रें फेर ली गईं
– सामाजिक न्याय के बजाय “धार्मिक पहचान” को ही राजनीति का केंद्र बना दिया गया

आज की खामोशी: वही पुरानी कहानी?

आज जब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया है, तब भी देश के कई बड़े मुस्लिम संगठन—जमीयत उलेमा-ए-हिंद, जमात-ए-इस्लामी हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मुस्लिम राजनीतिक दल, सेकुलर दल और बुधजीवी—इस मुद्दे पर अपेक्षित स्तर की मुखर प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं।
सवाल वही है: क्या यह मुद्दा उनकी प्राथमिकता में नहीं है? या फिर पसमांदा समाज की समस्याएँ अब भी हाशिए पर ही हैं? यह खामोशी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की कमी को भी दर्शाती है।
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ का स्पष्ट मत है कि यह फैसला UGC के हालिया मुद्दे को दबाने के लिए हो सकता है।

अगर तब आवाज़ उठती, तो आज हालात अलग होते?
यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिकल्पना है—यदि 1950 में ही मुस्लिम नेतृत्व (जिसमें कांग्रेस समर्थित अशराफ नेतृत्व शामिल था) इस धार्मिक प्रतिबंध का विरोध करता और पसमांदा वर्ग की वास्तविक स्थिति को संविधान सभा में मजबूती से रखा जाता, तो संभव है कि अनुसूचित जाति की परिभाषा धर्म-निरपेक्ष होती। पसमांदा मुसलमान और ईसाई दलित आज इस अधिकार से वंचित न होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ—और इसका खामियाजा आज भी लाखों लोग भुगत रहे हैं। कांग्रेस के लंबे शासनकाल में इस अन्याय को सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया गया, बल्कि इसे बनाए रखा गया।

अब आगे क्या? पसमांदा आंदोलन की दिशा आज की परिस्थिति में पसमांदा समाज के सामने दो स्पष्ट रास्ते हैं:

1. स्वतंत्र सामाजिक-राजनीतिक आवाज़ बनाना
अब यह स्पष्ट हो चुका है कि पारंपरिक नेतृत्व (चाहे कांग्रेस हो या मुख्यधारा मुस्लिम संगठन) से न्याय की उम्मीद सीमित है। पसमांदा समाज को अपनी स्वतंत्र वैचारिक और राजनीतिक ताकत विकसित करनी होगी।

2. संवैधानिक लड़ाई को तेज करना
– अनुच्छेद 341 के धार्मिक प्रतिबंध को चुनौती   – संविधान पीठ में पुनर्विचार की मांग  – सामाजिक न्याय के आधार पर पुनर्परिभाषा की पहल

निष्कर्ष: इतिहास से सबक लेने का समय

यह केवल एक कानूनी या धार्मिक मुद्दा नहीं है—यह प्रतिनिधित्व, न्याय और समानता का प्रश्न है। पसमांदा समाज के साथ हुआ यह अन्याय दो स्तरों पर हुआ है:

1. कांग्रेस शासन और संवैधानिक ढांचे में धार्मिक प्रतिबंध के रूप में    2. मुस्लिम समाज के भीतर अशराफ नेतृत्व की उपेक्षा के रूप में

अब समय आ गया है कि इतिहास की गलतियों को स्वीकार किया जाए, नेतृत्व की जवाबदेही तय की जाए, और पसमांदा समाज को उसका वास्तविक हक और सम्मान दिलाने के लिए संगठित संघर्ष किया जाए।

 

मुहम्मद यूनुस
सीईओ
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़