सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के “कॉकरोच” वाले बयान की एआइपीएमएम ने घोर निंदा की

न्यायाधीश से मांगी सार्वजनिक माफी, युवाओं को भावनात्मक उत्तेजना से बचने की अपील

नई दिल्ली | ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ ने सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश श्री सूर्याकांत शर्मा द्वारा गरीब, बेरोज़गार युवाओं, पत्रकारों, सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स, आरटीआई एक्टिविस्ट्स तथा अन्य जागरूक नागरिकों को “कॉकरोच” कहकर दिए गए कथित अपमानजनक बयान की घोर निंदा की है।
संगठन का दृढ़ मत है कि यदि न्यायाधीश से ऐसी अनुचित और असंवेदनशील टिप्पणी हुई है, तो उन्हें अपनी गलती स्वीकार करते हुए देश के युवाओं, खासकर गरीब और वंचित वर्ग के युवाओं से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए । सर्वोच्च न्यायालय जैसे गरिमामय संस्थान के न्यायाधीश से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी भाषा और अभिव्यक्ति में संयम और संवेदनशीलता बरतें, क्योंकि उनकी एक टिप्पणी पूरे समाज पर गहरी छाप छोड़ सकती है।
संगठन जोर देकर कहता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में युवाओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों का पूरा सम्मान होना चाहिए। किसी भी वर्ग या समुदाय को “कॉकरोच” जैसी अपमानजनक और घृणित भाषा से संबोधित करना पूरी तरह अनुचित, असंसदीय और लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है।

पसमांदा मुस्लिम युवाओं से विशेष अपील- ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ पसमांदा मुस्लिम समाज के युवाओं से विशेष अपील करता है कि वे तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे भावनात्मक, उत्तेजक नारों और बिना सोचे-समझे लिए जाने वाले राजनीतिक फैसलों से पूरी दूरी बनाए रखें।
केवल भावनाओं की उत्तेजना में आकर किसी आंदोलन, धरना-प्रदर्शन या राजनीतिक गतिविधि में शामिल होना कई बार युवाओं के लिए नुकसानदायक साबित होता है। इतिहास गवाह है कि ऐसे मामलों में प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं, उनके भविष्य को खतरे में डाला जाता है।
इसलिए संगठन सभी युवाओं, विशेष रूप से पसमांदा मुस्लिम युवाओं से आह्वान करता है कि वे संयम, समझदारी और दूरदृष्टि के साथ हर निर्णय लें। उकसावे में आने के बजाय वे शिक्षा, कौशल विकास, सामाजिक जागरूकता, संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीकों पर ध्यान केंद्रित करें।
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ का मानना है कि सच्चा परिवर्तन उग्रता और भावनात्मक उत्तेजना से नहीं, बल्कि निरंतर शिक्षा, एकजुटता, कानूनी जागरूकता और शांतिपूर्ण संघर्ष से आता है।