नबी-ए-करीम ﷺ के जलील-उल-क़द्र सहाबी और इस्लाम के बहुत बड़े आलिम-ए-दीन थे।
तआरुफ़ – नाम: मुआज़ बिन जबल
– क़बीला: अंसार के ख़ज़रज क़बीले से
– लाक़ब: इमाम-उल-उलेमा (आलिमों के इमाम)
– इस्लाम: 18 साल की उम्र में बैअत-ए-अक़बा-ए-सानिया में इस्लाम कुबूल किया।
– वफ़ात: 33 साल की उम्र में ताऊन-ए-अमवास (फिलिस्तीन) में 18 हिजरी में शहीद हुए।
नबी ﷺ की नज़र में मक़ाम हुज़ूर ﷺ ने इनके बारे में कई बड़ी बातें फ़रमाई हैं:
1. हलाल-हराम के सबसे बड़े आलिम: नबी ﷺ ने फ़रमाया – _”हलाल और हराम का सबसे ज़्यादा जानने वाला मुआज़ बिन जबल है।”_ [तिर्मिज़ी]
2. क़ुरआन के आलिम: आप उन 4 सहाबा में से थे जिनसे क़ुरआन सीखने का हुक्म दिया गया। फ़रमाया – _”क़ुरआन चार लोगों से सीखो – अब्दुल्लाह बिन मसऊद, सालिम मौला अबू हुज़ैफ़ा, उबई बिन कअब और मुआज़ बिन जबल से।”_
3. अल्लाह का महबूब: एक दिन नबी ﷺ ने आपका हाथ पकड़ कर फ़रमाया – _”ए मुआज़! अल्लाह की क़सम मैं तुमसे मोहब्बत करता हूँ।”_ फिर एक दुआ सिखाई जो हर नमाज़ के बाद पढ़नी है:
> _अल्लाहुम्मा अइन्नी अला ज़िक्रिका व शुकरिका व हुस्नि इबादतिक_
अहम कारनामे – यमन के गवर्नर और मुअल्लिम: जब नबी ﷺ ने आपको यमन भेजा तो पूछा – “फैसला कैसे करोगे?” आपने कहा – “पहले क़ुरआन से, फिर हदीस से, फिर अपनी इज्तिहाद से।” नबी ﷺ बहुत खुश हुए और आपकी पीठ थपथपाई।
यमन भेजते वक़्त नसीहत की – _”लोगों के लिए आसानी पैदा करना, सख्ती नहीं। खुशखबरी देना, नफ़रत मत दिलाना।”_- फ़क़ीह-ए-उम्मत: हज़रत उमर रज़ि० कहते थे – “जो भी फ़िक़्ह का मसला पूछना चाहे तो मुआज़ बिन जबल के पास जाए।” – जिहाद में: बद्र समेत तमाम ग़ज़वात में शरीक रहे।
आपने फ़रमाया था: “इल्म हासिल करो, क्योंकि अल्लाह के लिए इल्म सीखना नेकी है, उसे तलाश करना इबादत है, और उसे दूसरों को सिखाना सदक़ा है।” आपका मज़ार आज भी जॉर्डन के ग़ौर इलाके में है, जिसे अर्दुन में “सहाबा सिटी” कहा जाता है। अल्लाह हम सबको हज़रत मुआज़ बिन जबल रज़ि० के इल्म और अमल पर चलने की तौफ़ीक़ दे।
हज़रत मुआज़ खुद फ़रमाते हैं: _”मुझे मेरे महबूब ﷺ ने 10 बातों की वसीयत की।”_
नबी ﷺ की 10 नसीहतें हज़रत मुआज़ को
1. शिर्क न करना: चाहे तुम्हें काट दिया जाए या जला दिया जाए, अल्लाह के साथ किसी को शरीक मत करना।
2. वालिदैन की ना-फ़रमानी न करना: चाहे वो तुम्हें अपने घर और माल से निकल जाने का हुक्म दें, तब भी उनकी फ़रमाबरदारी करना।
3. फ़र्ज़ नमाज़ कभी जान-बूझकर न छोड़ना: जिसने जान-बूझकर फ़र्ज़ नमाज़ छोड़ी, उससे अल्लाह की ज़िम्मेदारी उठ जाती है।
4. शराब न पीना: शराब हर बुराई की जड़ है।
5. अल्लाह की ना-फ़रमानी से बचना: गुनाह से अल्लाह का ग़ज़ब नाज़िल होता है।
6. जिहाद से न भागना: चाहे सारे साथी हलाक हो जाएं, मैदान-ए-जंग से पीठ मत फेरना।
7. जब लोगों में वबा (महामारी) आए तो वहीं डटे रहना: अगर किसी जगह ताऊन / बीमारी फैले तो वहाँ से मत भागना, वहीं सब्र करना।
8. अपने घर वालों पर खर्च करना: अपनी हैसियत के मुताबिक अपने अहल-ओ-अयाल पर खर्च करो, उनसे हाथ मत खींचो।
9. अदब के लिए डंडा उठाते रहना: अपने बच्चों को अदब सिखाने में सख्ती से काम लेना।
10. अल्लाह से डराते रहना: अपने घर वालों को हमेशा अल्लाह का ख़ौफ़ दिलाते रहना।
> ये 10 नसीहतें पूरी इंसानियत के लिए हैं – ईमान, इबादत, अख़लाक़, घर और समाज सब इसमें आ गया।
हुज़ूर ﷺ ने यमन रवाना करते वक़्त एक और मशहूर नसीहत फ़रमाई थी: “आसानी पैदा करना, सख्ती मत करना। खुशखबरी देना, नफ़रत मत दिलाना। और लोगों से मिल-जुल कर रहना।”

