क्या आपने कभी सोचा कि बाबासाहेब अंबेडकर ने धर्म बदलना क्यों चुना? वह नास्तिक क्यों नहीं बने, जबकि उनके समय में बोल्शेविक क्रांति हो चुकी थी और नास्तिकता का विचार फैल रहा था? दरअसल, अंबेडकर ने अपने फैसले में गहरी सोच और भारतीय समाज की सच्चाई को रखा। बोल्शेविक क्रांति (1917) ने रूस में साम्यवाद को जन्म दिया, जिसमें ईश्वर और धर्म को नकारकर भौतिकवाद पर जोर था। यह विचार उस वक्त दुनिया में मशहूर था और भारत में भी इसका असर था। मगर अंबेडकर ने नास्तिकता की बजाय बौद्ध धर्म को अपनाया, क्योंकि वे जानते थे कि भारत में धर्म लोगों की जिंदगी और समाज का अहम हिस्सा है।
हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था ने दलितों को सैकड़ों साल तक दबाया था। अंबेडकर समझते थे कि नास्तिक बनने से वह खुद तो इस व्यवस्था को ठुकरा सकते थे, लेकिन अपने समुदाय को नई ताकत या दिशा देना मुश्किल होता। इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म को चुना, जो उनके लिए सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि समाज में बराबरी और इंसाफ की लड़ाई का हथियार था। बौद्ध धर्म की तर्कसंगत और नैतिक बातें उनके वैज्ञानिक नजरिए से मेल खाती थीं। उन्होंने इसे “नवयान” बनाया, जो सामाजिक बदलाव पर जोर देता था। इस तरह, उनका फैसला सोचा-समझा और भारतीय हालात के हिसाब से सही था।
इसी तरह, पसमांदा आंदोलन के लोग भी मानते हैं कि धर्म को छोड़ना जरूरी नहीं। हिंदू धर्म और इस्लाम में कई फर्क हैं, मगर इस्लाम बराबरी की बात करता है। पसमांदा बुद्धिजीवी, जैसे मसऊद आलम फलाही जैसे विचारकों ने धार्मिक ग्रंथों की नई व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने इस्लामिक शिक्षाओं से समानता और न्याय का संदेश खोजा और साबित किया कि धर्म दमनकारी नहीं बल्कि मुक्ति दिलाने वाला हो सकता है। यह आंदोलन दिखाता है कि बिना बराबरी के कोई समाज मजबूत नहीं रह सकता। मुस्लिम समाज में अशराफ वर्ग का दबदबा अब कम हो रहा है, क्योंकि पसमांदा लोग कुरान से अपने हक तलाश रहे हैं।
पसमांदा आंदोलन सिर्फ आज की समस्याओं का जवाब नहीं, बल्कि एक बड़ा बदलाव लाने का रास्ता है। पसमांदा मुसलमान अब अपनी आवाज उठा रहे हैं—चाहे वह सामाजिक, धार्मिक या सियासी मंच हो। यह साबित करता है कि धर्म सिर्फ सत्ता का खेल नहीं, बल्कि बराबरी का जरिया भी बन सकता है। बस इसे सही ढंग से समझने और इस्तेमाल करने की जरूरत है। हर इंसान को सम्मान और बराबरी का हक है, और पसमांदा आंदोलन यही संदेश दे रहा है।
~अब्दुल्लाह मंसूर