उत्तर प्रदेश की राजनीति में पसमांदा आंदोलन और पिछड़ों की हिस्सेदारी

उत्तर प्रदेश की राजनीति पिछले तीन दशकों में बड़े सामाजिक और सियासी बदलावों की गवाह रही है। कुर्मी, मौर्या, राजभर, चौहान और लोध जैसी गैर-यादव पिछड़ी एवं अति पिछड़ी जातियाँ अब अपनी जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक हिस्सेदारी हासिल करने में काफी हद तक सफल हुई हैं। भाजपा सरकारों में इन वर्गों के नेताओं को जिस प्रकार से प्रतिनिधित्व मिला है, वह इस बात का प्रमाण है कि ये समुदाय अपनी सियासी ताक़त को पहचान चुके हैं और उसका उपयोग करना सीख गए हैं।

इसके विपरीत, पसमांदा मुसलमान—जो उत्तर प्रदेश की मुस्लिम आबादी का लगभग 80-85% हैं—अब तक कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए स्थायी वोट बैंक रहे। लेकिन उन्हें उनकी आबादी के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व या सामाजिक-आर्थिक तरक्की शायद ही कभी मिली। आज “पसमांदा आंदोलन” इस समुदाय की नई राजनीतिक चेतना और हिस्सेदारी की मांग का प्रतीक बन चुका है।

ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ पसमांदा समाज को जागरूक करने और मुख्यधारा में शामिल करने की दिशा में लगातार सक्रिय हैं। महाज़ का वर्तमान नेतृत्व समाज को यह समझाने में सफल हुआ है कि अशरफ मुस्लिम समाज द्वारा बनाए गए धार्मिक मकड़जाल से निकलकर बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, आर्थिक विकास और राजनीतिक हिस्सेदारी पर ध्यान देना जरूरी है। अब यह चेतना पनप रही है कि पसमांदा मुसलमान अपने वोट का निर्णय स्वयं करें और जिस पार्टी से उन्हें हिस्सेदारी और सम्मान मिले, उसी को समर्थन दें।

पसमांदा आंदोलन का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य- ‘पसमांदा’ शब्द उर्दू से आया है, जिसका अर्थ है “जो पीछे छूट गए।” यह मुस्लिम समाज के दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदायों के लिए प्रयुक्त होता है। इस आंदोलन की जड़ें संत कबीर तक जाती हैं, जिन्होंने जातिवाद और धार्मिक पाखंड का विरोध किया और सामाजिक समानता की बात की। लेकिन उच्च वर्गीय मुसलमानों (अशराफ) ने उनके विचारों को चुनौती दी और उन्हें हाशिए पर धकेलने की कोशिश की।

20वीं सदी में यह आंदोलन संगठित रूप लेने लगा। 1910 के दशक में बिहार के अब्दुल कय्यूम अंसारी और मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी ने मोमिन कॉन्फ्रेंस की स्थापना की, जिसने मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया और सामाजिक न्याय की मांग उठाई।

1990 के दशक में डॉ. एजाज अली और अली अनवर जैसे नेताओं ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाया। हालांकि राज्यसभा की सदस्यता मिलने के बाद इन नेताओं की सक्रियता सीमित हो गई। इसके बाद 2021 में अलीगढ़ में ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ का पुनर्गठन किया गया और संगठन का रजिस्ट्रेशन कराया गया उसके बाद से संगठन ने पसमांदा मुस्लिम समाज की आवाज़ को हर फोरम पर मजबूती से उठाया और ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ एक ऐसा संगठन बनकर उभरा है जिसका नाम हर राजनीतिक दलों के यह चर्चा का विषय बना हुआ है। साहित्यिक स्तर पर अली अनवर की मसावात की जंग (2001) और मसूद आलम फलाही की हिंदुस्तान में जात-पात और मुसलमान (2007) जैसी पुस्तकों ने डॉक्टर खालिद अनीस अंसारी, डॉक्टर फैय्याज अहमद फैजी, अब्दुल्लाह मंसूर जैसे पसमांदा विचारक और पसमांदा एक्टिविस्ट ने मुस्लिम समाज में जातिगत भेदभाव और अशराफ वर्चस्व को उजागर किया और पसमांदा मुस्लिम समाज को उनके असली मुद्दों पर बात करने हेतु निरंतर प्रयासरत हैं।

सपा की जातिवादी और परिवारवादी राजनीति

मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद 1990 के दशक में सपा ने “मुस्लिम-यादव” (MY) समीकरण के सहारे सत्ता पाई। लेकिन सपा की राजनीति मुख्य रूप से यादवों और अशराफ मुसलमानों तक सिमट गई।

2012-2017 की सपा सरकार में मंत्रिमंडल के 40% से अधिक पद यादवों को मिले। गैर-यादव ओबीसी (कुर्मी, मौर्या, राजभर) और पसमांदा मुसलमानों को मात्र 15-20% प्रतिनिधित्व मिला।

2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 401 सीटों में से 27% टिकट यादव उम्मीदवारों को दिए, जबकि गैर-यादव ओबीसी को लगभग 20-22% और पसमांदा मुसलमानों को सिर्फ 5-7% टिकट ही मिले।

सच्चर कमेटी (2006) की रिपोर्ट में साफ़ कहा गया कि पसमांदा मुसलमानों की साक्षरता दर 40% से कम और सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी 5% से भी कम है। इसके बावजूद सपा ने उनकी शिक्षा, रोजगार या राजनीतिक भागीदारी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

गैर-यादव ओबीसी का भाजपा की ओर झुकाव

2014 और 2017 में गैर-यादव ओबीसी वर्गों ने सपा से दूरी बनाकर भाजपा का समर्थन किया। भाजपा ने इन वर्गों को टिकट और नेतृत्व में प्राथमिकता दी।

2017 में भाजपा ने 312 सीटें जीतीं, जिनमें गैर-यादव ओबीसी की बड़ी भूमिका थी। 2022 में भी भाजपा ने स्वतंत्र देव सिंह (कुर्मी) और ओम प्रकाश राजभर (राजभर) जैसे नेताओं को अहम पद देकर संदेश दिया कि पार्टी उन्हें प्रतिनिधित्व दे रही है।

‘ओबीसी महाकुंभ’ और सामाजिक न्याय से जुड़े आयोजनों ने भी इन वर्गों को भाजपा की ओर आकर्षित किया।

पसमांदा मुसलमानों की सियासी जागृति

उत्तर प्रदेश की मुस्लिम आबादी में बहुमत रखने वाले पसमांदा अब अपनी उपेक्षा को गहराई से समझने लगे हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 62 सीटों में से केवल 4 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें अधिकांश अशराफ थे। दूसरी ओर भाजपा ने 75 सीटों में 5 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें 2 पसमांदा थे।

पसमांदा समाज में यह सवाल अब ज़ोर पकड़ रहा है कि जब उनकी संख्या इतनी अधिक है तो हिस्सेदारी इतनी कम क्यों? यही वजह है कि आंदोलन धीरे-धीरे उन्हें सियासी रूप से सक्रिय कर रहा है।

भाजपा ने 2022 में ‘पसमांदा बुद्धिजीवी सम्मेलन’ और ‘कौमी चौपाल’ जैसे कार्यक्रमों से इस वर्ग को साधने की कोशिश की। योगी सरकार में दानिश अंसारी जैसे पसमांदा नेता को मंत्री बनाना भी इसी रणनीति का हिस्सा था।

सपा की चुनौतियाँ और भविष्य

2022 में सपा ने 32.1% वोट शेयर हासिल किया, लेकिन गैर-यादव ओबीसी और पसमांदा का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर ही रहा।

सपा का ‘पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (PDA)’ नारा भी पसमांदा और गैर-यादव ओबीसी को जोड़ने में पूरी तरह सफल नहीं हुआ। उपचुनावों में भी पसमांदा-बहुल इलाक़ों में सपा का प्रदर्शन कमजोर रहा।

अगर सपा अपनी रणनीति नहीं बदलती और पसमांदा समाज को प्रतिनिधित्व नहीं देती, तो वह कांग्रेस जैसी स्थिति में पहुँच सकती है—जहाँ संगठन और वोट बैंक दोनों कमजोर हो चुके हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े और पसमांदा समाज का समीकरण अब निर्णायक मोड़ पर है। गैर-यादव ओबीसी पहले ही भाजपा के साथ जुड़कर अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर चुके हैं। अब पसमांदा मुसलमान भी अपनी ताक़त को पहचान रहे हैं।

यदि यह समुदाय संगठित होकर अपनी हिस्सेदारी की मांग करता है, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का संतुलन बदल जाएगा। सपा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह पसमांदा मुसलमानों और गैर-यादव पिछड़ों को वास्तविक प्रतिनिधित्व दे। अन्यथा, वह धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर चली जाएगी।

 

मुहम्मद युनुस
मुख्य कार्यकारी अधिकारी सीईओ
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़