आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ — एक राष्ट्रवादी सामाजिक क्रांति की ओर पहला कदम

1. प्रस्तावना: मिशन, दृष्टिकोण और संकल्प- आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक जनजागरण अभियान है। हमारा उद्देश्य है—भारत के पसमांदा मुस्लिम समाज को सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना।

हमारा मिशन—“जागरूकता से नेतृत्व तक”—पसमांदा समाज को अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त कर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और राजनीतिक हिस्सेदारी के रास्ते पर आगे बढ़ाना है। हम मानते हैं कि किसी भी समाज की असली ताक़त उसके शिक्षित, आर्थिक रूप से मज़बूत और आत्मविश्वासी नागरिक होते हैं। भारत की मुस्लिम आबादी में पसमांदा वर्ग का अनुपात लगभग 80-85% है (2011 की जनगणना और सामाजिक सर्वेक्षणों के अनुसार)। इसके बावजूद यह वर्ग दशकों से सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे निचले पायदान पर है, जो उपेक्षा, भेदभाव और नीतिगत अनदेखी का परिणाम है।

हमारा लक्ष्य है—पसमांदा समाज को भारत की मुख्यधारा में न केवल सम्मिलित करना, बल्कि निर्णायक नेतृत्व की भूमिका में लाना, ताकि वह अपने भविष्य के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभा सके।

2. इतिहास से सीख: संघर्ष, साजिश और जीत- इतिहास हमें सिखाता है कि जब भी कोई वंचित समाज अपने अधिकारों के लिए संगठित होता है, तो उसके खिलाफ बाधाएँ खड़ी की जाती हैं।
चाहे बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का दलित आंदोलन हो, या अमेरिका में डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर का Civil Rights Movement—हर बार काउंटर-आंदोलन तैयार किए गए और कई बार उसी समाज के लोगों को मोहरा बनाया गया।

लेकिन सच, न्याय और जनहित पर आधारित आंदोलन अंततः विजयी होते हैं। आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ भी इसी सिद्धांत पर काम कर रहा है—हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति, धर्म या दल के खिलाफ नहीं, बल्कि अज्ञानता, अन्याय और भेदभाव के खिलाफ है।

वास्तविक उदाहरण: रुक्साना खातून (नाम परिवर्तित), बहराइच, यूपी—आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छोड़ने वाली थी। संगठन की मदद से इंटरमीडिएट अच्छे अंकों से पास किया और आज शिक्षिका बनकर अन्य लड़कियों को प्रेरित कर रही है।

बिहार, झारखंड और यूपी में—कई बच्चियों की शादियों, बीमार लोगों के इलाज और बच्चों की पढ़ाई के लिए ज़कात फंड से सहायता प्रदान की गई।

3. भ्रमजाल और काउंटर-संगठन: सच्चाई को पहचानें- कुछ ताक़तें पसमांदा समाज में जातीय विभाजन (अर्जाल-अजलफ़) का दुरुपयोग करके “काउंटर-संगठन” खड़े कर रही हैं। ये संगठन असल में अशरफ़ मुस्लिम नेतृत्व के मोहरे हैं, जिनका उद्देश्य असली पसमांदा आंदोलन को कमजोर करना है। साथ ही, कुछ लोग हमें जानबूझकर किसी विशेष राजनीतिक दल—जैसे बीजेपी या RSS—से जोड़कर बदनाम करने की कोशिश करते हैं।

हमारा स्पष्ट रुख:

हम किसी एक राजनीतिक दल के समर्थक नहीं। पसमांदा समाज के लोग सभी राजनीतिक दलों में रहकर अपने हित की रक्षा करें। जातीय या राजनीतिक आधार पर नहीं, बल्कि एकता के आधार पर संघर्ष किया जाए। हमारा जवाब—काम, उपलब्धियों और पारदर्शिता के ज़रिए।

4. दलित समाज से प्रेरणा: एकजुटता की ताक़त- दलित समाज ने यह साबित किया है कि चाहे नेता किसी भी पार्टी में हों, जब मुद्दा पूरे समाज का हो, तो वे एकजुट होकर आवाज़ उठाते हैं। शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर उनकी यह एकजुटता ऐतिहासिक बदलाव लाने में सफल रही। पसमांदा समाज को भी यही रास्ता अपनाना होगा—जातीय खाँचों से निकलकर साझा पहचान में एक होना।

हमारा नारा:
“एकता में बल है, और एकता ही हमारी जीत की कुंजी।”

5. ज़मीनी बदलाव के लिए हमारी रणनीति

हम केवल नारे नहीं लगाते—हम ज़मीनी स्तर पर ठोस काम करते हैं।

(क) शिक्षा का प्रसार:

सामुदायिक शिक्षा केंद्र और कोचिंग संस्थान। ज़रूरतमंद छात्रों के लिए स्कॉलरशिप। शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाना। > तथ्य: पसमांदा समुदाय की साक्षरता दर ~60% है, जो राष्ट्रीय औसत 74% से कम है।

(ख) राजनीतिक सशक्तिकरण: पंचायत से संसद तक नेतृत्व प्रशिक्षण। मतदाता जागरूकता अभियान।

(ग) आर्थिक आत्मनिर्भरता: सिलाई, हस्तकला, डिजिटल स्किल्स जैसे कौशल प्रशिक्षण। स्वरोज़गार के लिए माइक्रो-लोन और सरकारी योजनाओं की जानकारी।

(घ) सामाजिक न्याय: जातीय-धार्मिक भेदभाव के खिलाफ जागरूकता। सभी के लिए समान अधिकार और सम्मान सुनिश्चित करना।

वास्तविक उदाहरण: पश्चिम बंगाल के अहमद अली (नाम परिवर्तित) को सरकारी योजना की जानकारी और आर्थिक मदद देकर एक छोटा व्यवसाय शुरू कराया गया। आज वह आत्मनिर्भर है और अन्य युवाओं को प्रेरित कर रहा है।

6. चुनौतियाँ और समाधान

मुख्य चुनौतियाँ: शिक्षा में पिछड़ापन। बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता। जातीय और धार्मिक भेदभाव। राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी।

हमारे समाधान: शिक्षा: सामुदायिक स्कूल, लाइब्रेरी, स्कॉलरशिप।  रोज़गार: कौशल प्रशिक्षण, उद्यमिता प्रोत्साहन। राजनीतिक जागरूकता: नेतृत्व कार्यशालाएँ, मतदान अभियान।

7. निष्कर्ष और आह्वान

हमारा सपना—एक ऐसा पसमांदा समाज जो शिक्षित, आत्मनिर्भर, सम्मानित और नेतृत्वकारी हो।
हम किसी व्यक्ति, दल या विचारधारा के विरोधी नहीं; हम केवल अन्याय, अज्ञानता और गरीबी के विरोधी हैं।
हम तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक पसमांदा समाज अपने हक़ और सम्मान की स्थिति हासिल नहीं कर लेता।

आह्वान: आइए, हम सब मिलकर इस सकारात्मक क्रांति का हिस्सा बनें। शिक्षा, एकता और सशक्तिकरण के पथ पर चलकर, पसमांदा समाज को भारत की मुख्यधारा में निर्णायक स्थान दिलाएँ।

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जय हिंद! जय पसमांदा!
मुहम्मद युनुस
मुख्य कार्यकारी अधिकारी सीईओ
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़