मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में जब ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच तनाव और संघर्ष बढ़ता जा रहा है, तब यह देखकर अफ़सोस होता है कि मुस्लिम समाज के कुछ लोग भावनाओं में बहकर अरब देशों के बर्बाद होने की दुआएँ करने लगे हैं। वे ईरान द्वारा अरब देशों पर हमले करने की बात कर रहे हैं, हज-उमरा जैसे इस्लामी फ़र्ज़ को बहिष्कार (boycott) करने तक की बातें कर रहे हैं। कुछ लोग तो इस हद तक जज़्बाती हो गए हैं कि वे अरब देशों को बर्बाद करने के लिए ईरान को न्यूक्लियर warfare इस्तेमाल करने की बात तक कर रहे हैं।
यह न केवल गैर-जिम्मेदाराना सोच है, बल्कि हकीकत से भी बहुत दूर है। ईरान पर किया गया हमला बिल्कुल न्यायसंगत नहीं है और इसकी निंदा करना उचित है, लेकिन ईरान भी बिल्कुल निर्दोष नहीं है।
हमें यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल भावनाओं, नारों या धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं चलती। जियो-पॉलिटिक्स का मतलब सिर्फ़ युद्ध, सैन्य गठजोड़ या किसी देश के समर्थन-विरोध तक सीमित नहीं है। इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा संसाधन और वैश्विक आर्थिक संतुलन की होती है।
आज खाड़ी और अरब देशों में लगभग 90 लाख से अधिक भारतीय नागरिक काम कर रहे हैं। इनमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी समुदायों के लोग शामिल हैं। इनमें बड़ी संख्या में मजदूर, तकनीशियन, इंजीनियर, डॉक्टर, छोटे-बड़े कारोबारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च पदों पर कार्यरत भारतीय शामिल हैं। इनकी मेहनत से जो विदेशी मुद्रा भारत आती है, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और करोड़ों परिवारों की रोज़ी-रोटी इसी से जुड़ी हुई है।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता का सीधा और गहरा असर भारत पर पड़ता है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण 1990-91 का इराक-कुवैत युद्ध है। जब इराक ने कुवैत पर हमला किया, तब खाड़ी क्षेत्र में भयंकर संकट पैदा हो गया था। उस समय लगभग 1.75 लाख भारतीयों को मजबूरन भारत लौटना पड़ा, जिसे इतिहास में सबसे बड़े रिवर्स माइग्रेशन में से एक माना जाता है।
उस युद्ध के कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आया, विदेशी मुद्रा भंडार तेज़ी से घटा और भारत की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फँस गई। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि भारत को अपने विदेशी कर्ज़ और भुगतान संतुलन को संभालने के लिए सोना तक गिरवी रखना पड़ा। अंततः इसी आर्थिक संकट के बाद प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव की सरकार में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण (Liberalisation) की नीति लागू की, जिसने आगे चलकर भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी।
यह इतिहास हमें चेतावनी देता है कि अगर आज खाड़ी और अरब देशों में बड़ा संकट पैदा होता है या वहाँ की स्थिरता को गंभीर नुकसान पहुँचता है, तो उसके परिणाम भारत के लिए भी अत्यंत गंभीर होंगे। तेल की कीमतों में भारी वृद्धि, विदेशी मुद्रा संकट और लाखों भारतीयों का रिवर्स माइग्रेशन—ये सभी परिस्थितियाँ एक साथ उत्पन्न हो सकती हैं।
अगर खाड़ी देशों से लाखों भारतीयों को वापस लौटना पड़ा, तो भारत में रोज़गार, व्यापार और सामाजिक संतुलन पर भारी दबाव पड़ेगा। इसका सबसे अधिक असर उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ेगा जिनकी आजीविका खाड़ी देशों में काम करने वाले सदस्यों पर निर्भर है। विशेष रूप से भारतीय मुसलमानों के लिए यह स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि रोज़गार और व्यापार के क्षेत्र में बढ़ती सांप्रदायिकता के बीच इतनी बड़ी संख्या में लोगों का वापस आना गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकट को जन्म दे सकता है।
हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि ईरान के साथ अन्याय होता है तो उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाना हमारा नैतिक दायित्व है। एक इंसाफ़पसंद नागरिक होने के नाते हमें हर उस जगह अन्याय के खिलाफ़ बोलना चाहिए जहाँ मानवता और न्याय पर हमला हो रहा हो। ईरान के लोगों के प्रति हमारी सहानुभूति स्वाभाविक है और रहनी भी चाहिए।
लेकिन यह बिल्कुल भी उचित नहीं है कि ईरान के प्रति सहानुभूति जताने के नाम पर हम अरब देशों की बर्बादी की दुआ करने लगें। यह सोच न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि हमारे अपने समाज और देश के हितों के भी खिलाफ़ है।
सच्चाई यह है कि भारतीय मुसलमानों के अधिकांश परिवारों का किसी न किसी रूप में खाड़ी देशों से संबंध है। शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसके रिश्तेदार, परिचित या समुदाय के लोग अरब देशों में रोज़गार से जुड़े न हों। इसलिए हमें भावनात्मक नारों और उत्तेजक भाषणों से ऊपर उठकर व्यावहारिक और दूरदर्शी सोच अपनानी होगी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को समझदारी और संतुलन के साथ देखें। हमें अमन, इंसाफ़ और स्थिरता की दुआ करनी चाहिए—न कि किसी देश या क्षेत्र की बर्बादी की।
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के लोग कुरान और नबी की सुन्नत पर चलने वाले लोग हैं। संगठन का मत है कि अरब देशों ने इस मुसीबत की घड़ी में सुल्ह-ए-हुदैबिय्या और मिसाक-ए-मदीना तथा “लाकुम दीनुकुम वलियादीन” पर चलते हुए युद्ध में नहीं जाकर बातचीत और समझौते का रास्ता चुना है, जो बिल्कुल सही निर्णय है।
अल्लाह से दुआ है कि दुनिया में अमन कायम हो, सभी देशों के बीच तनाव कम हो और इंसानियत को युद्ध और तबाही से बचाया जा सके।
मुहम्मद यूनुस
सी.ई.ओ., ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़

