मदरसों में दीनी तालीम के साथ संविधान की पढ़ाई भी जरूरी – मौलाना अब्दुर रकीब रहमानी

शिक्षा, इत्तेहाद और जागरूकता से बदलेगी पसमांदा समाज की तस्वीर
उलेमा और मुफ्तियों को देश के कानून और संविधान की जानकारी होना जरुरी
जामताड़ा / झारखंड : ऑल इंडिया पसमांदा उलेमा बोर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता मौलाना अब्दुल रकीब रहमानी ने जामताड़ा नगर स्थित जामा मस्जिद धांधड़ा में जुमे की नमाज़ से पहले एक प्रभावशाली तकरीर करते हुए कहा कि पसमांदा समाज को पिछड़ेपन, गरीबी और अशिक्षा से बाहर निकालने का सबसे मजबूत और असरदार रास्ता “तालीम” है। उन्होंने समाज के लोगों से अपील करते हुए कहा कि वे अपने बच्चों को बेहतर और ऊँची शिक्षा दिलाने को अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं।
मौलाना रहमानी ने अपने संबोधन में कहा कि आज जिस समाज ने शिक्षा को अपनाया है, वही समाज तरक्की की बुलंदियों तक पहुंचा है। उन्होंने कहा कि पसमांदा समाज के लोगों को अब जागने की जरूरत है। केवल भावनात्मक नारों से समाज का विकास नहीं होगा, बल्कि शिक्षा, एकता और सामाजिक जागरूकता से बदलाव आएगा।
उन्होंने कहा कि “अगर हमें अपनी आने वाली नस्लों का भविष्य सुरक्षित करना है, तो हमें अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, वकील और कारोबारी बनाने की दिशा में काम करना होगा। तालीम के बिना किसी भी कौम की तरक्की मुमकिन नहीं है।”
मौलाना रहमानी ने अपने बयान में बोहरा मुस्लिम समाज का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे मुल्क में बोहरा मुसलमानों की आबादी बहुत कम है, लेकिन वे देश के बड़े-बड़े व्यापारिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान रखते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह उनके अंदर मौजूद इत्तेहाद, अनुशासन और शिक्षा के प्रति गंभीरता है। उन्होंने कहा कि अगर पसमांदा समाज भी शिक्षा और एकता को अपनाए, तो वह भी देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
उन्होंने मदरसों की शिक्षा व्यवस्था पर भी विस्तार से अपनी राय रखते हुए कहा कि आज समय की मांग है कि मदरसों में दीनी तालीम के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा को भी मजबूती से शामिल किया जाए। उन्होंने कहा कि जहां छोटे मदरसों में बच्चों को बेसिक आधुनिक शिक्षा दी जानी चाहिए, वहीं बड़े मदरसों और दारुल उलूमों में भी बदलाव की जरूरत है।
मौलाना रहमानी ने कहा कि जिन बड़े मदरसों में आलिम, फाजिल और मुफ्ती की डिग्रियां दी जाती हैं, वहां केवल धार्मिक किताबों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है। जिस तरह बुखारी शरीफ, अबू दाऊद शरीफ, तफ्सीर और फिक्ह की पढ़ाई होती है, उसी तरह “हिंदुस्तान का संविधान” भी एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।
उन्होंने जोर देकर कहा कि देश के संविधान और कानून की जानकारी हर आलिम, उलेमा और मुफ्ती के लिए जरूरी है, ताकि वे समाज को सही दिशा दे सकें और देश के लोकतांत्रिक ढांचे, नागरिक अधिकारों तथा संवैधानिक मूल्यों को बेहतर तरीके से समझ सकें। उन्होंने कहा कि जब हमारे उलेमा संविधान को समझेंगे, तभी वे समाज को कानून के दायरे में रहकर बेहतर मार्गदर्शन दे पाएंगे।
मौलाना रहमानी ने कहा कि इस्लाम शिक्षा, इंसाफ, अमन और इंसानियत का पैगाम देता है। इसलिए मुस्लिम समाज को हर तरह की कट्टरता और नफरत से दूर रहकर शिक्षा, भाईचारा और सामाजिक विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने युवाओं से सोशल मीडिया पर समय बर्बाद करने के बजाय किताबों और ज्ञान की ओर ध्यान देने की अपील की।
उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि मुस्लिम समाज अपने बच्चों की तालीम, रोजगार और चरित्र निर्माण पर ध्यान दे। अगर समाज का हर घर शिक्षित होगा तो आने वाला समय पसमांदा समाज के लिए नई रोशनी लेकर आएगा।
जुमे की नमाज़ से पहले हुई इस तकरीर को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। मौलाना रहमानी की बातों को लोगों ने गंभीरता से सुना और शिक्षा तथा सामाजिक सुधार को लेकर उनके विचारों की सराहना की।

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