धर्म के नाम पर नफरत नहीं, इंसानियत और सम्मान का रास्ता अपनाएं – मौलाना अब्दुर रकीब अंसारी
पसमांदा समाज की तरक्की के लिए शिक्षा, रोजगार और सम्मान जरूरी – मौलाना अब्दुर रकीब अंसारी
दिल्ली / गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद स्थित साहिबाबाद के गरिमा गार्डन में मदरसा अनवार-ए-शराफत के हॉल में जुमे की नमाज़ से पहले एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सामाजिक विषय पर विशेष तकरीर का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ऑल इंडिया पसमांदा उलमा बोर्ड के राष्ट्रीय संगठन मंत्री मौलाना अब्दुल रकीब अंसारी ने मीसाक़-ए-मदीना हिंदुस्तान के लिए मार्गदर्शन” विषय पर विस्तृत ख़िताब किया।
मौलाना अब्दुल रकीब अंसारी ने कहा कि मीसाक़-ए-मदीना केवल इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज नहीं, बल्कि इंसानी समाज में अमन, न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता, आपसी सम्मान, जिम्मेदारी और सामाजिक एकता का एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत है। उन्होंने कहा कि आज जब समाज में विभिन्न प्रकार के मतभेद, अविश्वास और दूरियां दिखाई देती हैं, ऐसे समय में मीसाक़-ए-मदीना की शिक्षाओं को समझना और उन्हें अपने सामाजिक जीवन में उतारना बेहद जरूरी है। मौलाना ने अपनी तकरीर में कहा कि मदीना पहुंचने के बाद पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.)ने वहां मौजूद विभिन्न समुदायों और कबीलों के बीच शांति एवं सामाजिक व्यवस्था कायम करने के लिए एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की, जिसमें अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक समूहों के अधिकारों तथा जिम्मेदारियों को महत्व दिया गया।
उन्होंने कहा, कि मीसाक़-ए-मदीना हमें यह संदेश देता है कि अलग-अलग धर्म, विचार और समुदाय के लोग अपने धार्मिक विश्वासों के साथ रहते हुए भी एक समाज, एक शहर और एक राष्ट्र की जिम्मेदारियों को मिलकर निभा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी मजबूत समाज की बुनियाद केवल आर्थिक विकास से नहीं बनती, बल्कि उसके लिए न्याय, विश्वास, जिम्मेदारी, कानून का सम्मान और नागरिकों के बीच पारस्परिक सम्मान आवश्यक है।
मौलाना अब्दुल रकीब अंसारी ने कहा कि भारत विविधताओं वाला देश है। यहां अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं। ऐसे देश में सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास को मजबूत करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि मीसाक़-ए-मदीना हमें सिखाता है कि समाज की मजबूती एक-दूसरे को कमजोर करने में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने में है। हिंदुस्तान जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में यह संदेश आज भी बेहद महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को केवल उसके धर्म, जाति, भाषा या समुदाय की वजह से दूसरे से नफरत नहीं करनी चाहिए। इंसाफ का तकाजा यह है कि जो अधिकार हम अपने लिए चाहते हैं, वही अधिकार दूसरों के लिए भी स्वीकार करें।
मौलाना ने कहा कि मीसाक़-ए-मदीना का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समझौते और सह-अस्तित्व की गुंजाइश मौजूद होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत में हर नागरिक को अपने धर्म और आस्था के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है और साथ ही दूसरों की आस्था का सम्मान करना भी सामाजिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर किसी के साथ अन्याय, अपमान या हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता। हमें अपने आचरण से यह साबित करना होगा कि धार्मिकता इंसान को बेहतर इंसान बनाती है।
अपने संबोधन में मौलाना ने न्याय को सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद बताते हुए कहा कि अगर समाज में न्याय कमजोर होगा तो आपसी विश्वास भी कमजोर होगा।
उन्होंने कहा कि गरीब हो या अमीर, कमजोर हो या ताकतवर, किसी भी व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। कानून और न्याय की व्यवस्था सबके लिए समान होनी चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से अपील की कि वे सोशल मीडिया पर आने वाली हर बात को सच न मानें और बिना पुष्टि किए किसी खबर, वीडियो या संदेश को आगे न बढ़ाएं।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में एक झूठी खबर कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। इसलिए किसी भी संदेश को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई की जांच करना हमारी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है।
मौलाना अब्दुल रकीब अंसारी ने कहा कि लोकतांत्रिक समाज में विचारों का अलग होना स्वाभाविक है। लोगों के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मतभेद को दुश्मनी में बदलना समाज के लिए नुकसानदायक है।
उन्होंने कहा कि हमारे बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत और सामाजिक सम्मान की डोर कमजोर नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज में संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना समय की जरूरत है। एक-दूसरे को सुनना, समझना और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना ही सभ्य समाज की पहचान है।
मौलाना ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल रोजगार या शिक्षा की नहीं, बल्कि सही और गलत सूचना में अंतर करने की भी है।
उन्होंने कहा कि युवाओं को शिक्षा, कौशल, चरित्र निर्माण, संविधान और कानून की समझ तथा समाज सेवा पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारे नौजवान देश की ताकत हैं। उन्हें नफरत की भाषा नहीं, ज्ञान की भाषा सीखनी चाहिए; टकराव नहीं, संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए और समाज को जोड़ने वाला काम करना चाहिए।
मौलाना ने कहा कि मीसाक़-ए-मदीना की भावना को केवल भाषणों तक सीमित रखने के बजाय समाज के जरूरतमंद लोगों की मदद के रूप में भी अपनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गरीब, अनाथ, विधवा, मजदूर, बुजुर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की सहायता करना समाज के सक्षम लोगों की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि एक आदर्श समाज वही है जहां मजबूत व्यक्ति कमजोर का सहारा बने और पड़ोसी की परेशानी को अपनी परेशानी समझा जाए।
पसमांदा समाज की शिक्षा और सामाजिक उत्थान पर जोर
मौलाना अब्दुल रकीब अंसारी ने पसमांदा समाज की स्थिति पर भी चर्चा करते हुए कहा कि समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सम्मान और अवसरों की उपलब्धता जरूरी है।
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की तरक्की केवल कुछ लोगों की तरक्की से नहीं हो सकती। जब समाज का अंतिम व्यक्ति शिक्षा और सम्मान के साथ आगे बढ़ेगा, तभी वास्तविक सामाजिक विकास संभव होगा।
उन्होंने लोगों से बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने, बेटियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने और युवाओं को आधुनिक कौशल से जोड़ने की अपील की।
मौलाना ने कहा कि मस्जिद और मदरसे केवल इबादत और धार्मिक शिक्षा के स्थान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, इंसानियत, सामाजिक जिम्मेदारी और शिक्षा के केंद्र भी हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चों और युवाओं को देश, समाज, संविधान, कानून, नैतिकता और नागरिक जिम्मेदारियों की जानकारी भी दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारी धार्मिक शिक्षा हमें समाज से काटने के लिए नहीं, बल्कि समाज की भलाई के लिए तैयार करती है।
अपने लंबे संबोधन के अंत में मौलाना अब्दुल रकीब अंसारी ने देश में अमन, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव की मजबूती के लिए दुआ की। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है और इस विविधता को संघर्ष का कारण नहीं बल्कि सामाजिक शक्ति बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मीसाक़-ए-मदीना का संदेश आज भी हमें यही प्रेरणा देता है कि इंसाफ कायम हो, हर नागरिक के अधिकारों का सम्मान हो, धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, कमजोरों की मदद हो और समाज में अमन तथा भाईचारा मजबूत हो। यही संदेश आज के हिंदुस्तान के लिए भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन बन सकता है।
इस अवसर पर मदरसा अनवार-ए-शराफत के हॉल में बड़ी संख्या में नमाज़ी एवं स्थानीय लोग मौजूद रहे। तकरीर के बाद जुमे की नमाज़ अदा की गई और देश में अमन, भाईचारे, खुशहाली तथा तरक्की के लिए विशेष दुआ की गई।

