आल इंडिया पसमांदा वेल्फेयर फंड लाया क्रांतिकारी समाधान: ज़कात अब अस्थायी राहत नहीं, स्थायी आत्मनिर्भरता बनेगी
लखनऊ। इस्लाम के पाँच स्तंभों में शामिल ज़कात (2.5%) का मूल उद्देश्य गरीबी की जड़ काटना और समाज को आत्मनिर्भर बनाना है। पैगंबर ﷺ का फरमान है कि “ज़कात लेनेवाला कल ज़कात देनेवाला बन जाए।” लेकिन 1400 साल बाद भी ज़कात दी और ली जा रही है फिर भी मुस्लिम समाज में गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है।
इस गंभीर स्थिति पर ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ (AIPMM) के आल इंडिया पसमांदा वेल्फेयर फंड के सीईओ मुहम्मद यूनुस ने कहा कि ज़कात अल्लाह का फर्ज़ है, लेकिन इसे सही तरीके से इस्तेमाल करना हमारी समझ और इरादे पर निर्भर है। अस्थायी राहत देने के बजाय हमें स्थायी समाधान पर ध्यान देना चाहिए।
वर्तमान में ज़कात का सबसे बड़ा हिस्सा मदरसों को जाता है जहां बच्चों को दीनी तालीम तो मिलती है लेकिन स्किल डेवलपमेंट, रोजगार या व्यापार की कोई ट्रेनिंग नहीं मिल पाती। मदरसा पास करने के बाद ज्यादातर बच्चे मजदूरी, रिक्शा चलाने या बेरोजगारी की स्थिति में आ जाते हैं। साथ ही गली-मोहल्लों में 20-20, 50-50 रुपये बाँटने से सिर्फ एक-दो महीने की राहत मिलती है और गरीबी जस की तस बनी रहती है।
उदाहरण के तौर पर यदि एक गली में 10 लोग ₹10,000 की ज़कात निकालते हैं तो कुल राशि ₹1,00,000 होती है। पुराने तरीके से इसे 100 गरीब परिवारों में ₹1,000 प्रत्येक बाँट दिया जाता है जिससे उन्हें सिर्फ एक महीने का राशन मिल जाता है लेकिन कोई भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाता।
आल इंडिया पसमांदा वेल्फेयर फंड ने ठीक यही बदलाव लाने का संकल्प लिया है। इस फंड के तहत ज़कात को एक जगह इकट्ठा करके पारदर्शी तरीके से संग्रहित किया जाएगा और 100 प्रतिशत फोकस स्थायी समाधान पर रखा जाएगा। इसमें स्किल ट्रेनिंग जैसे कंप्यूटर कोर्स, टेलरिंग, मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रीशियन, ब्यूटी पार्लर, ड्राइविंग और छोटे व्यापार की ट्रेनिंग दी जाएगी। ज़रूरतमंद युवाओं को माइक्रो-बिजनेस शुरू कराने में मदद की जाएगी जैसे किराना स्टोर, टेलरिंग यूनिट, ऑटो रिक्शा आदि। हर लाभार्थी को बिजनेस प्लान बनाने, 3 से 6 महीने तक व्यक्तिगत मेंटरशिप और बाजार लिंकेज प्रदान किया जाएगा। साथ ही उन्हें सरकारी योजनाओं जैसे मुद्रा लोन और स्टैंड-अप इंडिया से भी जोड़ा जाएगा। हर वर्ष पूर्ण ऑडिट कर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाएगी। मुख्य लक्ष्य हर लाभार्थी को अगले साल खुद ज़कात देने वाला बनाना है।
यदि यह मॉडल पूरे देश में लागू हो जाए तो एक शहर में 100 टीमें हर साल 2-2 परिवारों को आत्मनिर्भर बनाएँगी यानी हर साल 200 परिवार गरीबी से बाहर निकलेंगे। 5 साल बाद 1000 परिवार और 10 साल बाद 2000 परिवार गरीबी से मुक्त हो जाएंगे। पूरे उत्तर प्रदेश और देश स्तर पर लागू होने से मुस्लिम समाज की आर्थिक तस्वीर मात्र 10-15 साल में पूरी तरह बदल सकती है।
मुहम्मद यूनुस ने अंत में अपील की कि आइए अब सिर्फ दुआ नहीं बल्कि दुआ के साथ दिमाग और दस्त भी लगाएं। ज़कात सिर्फ पैसा नहीं बल्कि एक क्रांतिकारी आर्थिक व्यवस्था है। सोच बदलो, तरीका बदलो, समाज बदलो।
आल इंडिया पसमांदा वेल्फेयर फंड ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ की एक पहल है जो गरीबी को कम नहीं बल्कि उसे समाप्त करने का लक्ष्य रखती है।

