नई दिल्ली, (IANS)। जब भारत निर्वाचन आयोग ने दो चरणों में हुए मतदान में 92.47% के रिकॉर्ड मतदान की पुष्टि की, तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं था। यह पश्चिम बंगाल में स्वतंत्रता के बाद का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत था, जिसने 2011 के 84.72% के पुराने रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया। यह केवल चुनावी उत्साह नहीं, बल्कि उन लोगों की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति थी जिन्हें वर्षों तक दबाया गया, डराया गया और चुनावों में हल्के में लिया गया। पिछले चुनावों में ऐसे मामले सामने आए थे, जहाँ सत्ताधारी दल से जुड़े समूहों द्वारा चुनाव के दौरान हाई-राइज इमारतों को बंद कर दिया जाता था। वामपंथी शासनकाल से चली आ रही इस प्रवृत्ति के बीच टीएमसी लगातार ऐसे परिसरों में बूथ बनाए जाने का विरोध करती रही। इसलिए 92.93% मतदान केवल भागीदारी नहीं, बल्कि एक प्रकार का लोकतांत्रिक प्रतिरोध था।
मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों के आंकड़े एक ऐसी कहानी बताते हैं जिसे ईमानदारी और गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। पूरे भारत के मुसलमानों को इसे बिना किसी रक्षात्मक मानसिकता और राजनीतिक पक्षधरता के चश्मे से पढ़ना चाहिए।
राज्य विधानसभा की उन 27 सीटों पर, जहाँ मुस्लिम आबादी 30% से अधिक है और भाजपा ने जीत दर्ज की, भाजपा का औसत वोट शेयर 2021 के लगभग 38.9% से बढ़कर 2026 में 46.3% हो गया, जबकि टीएमसी का वोट शेयर 49% से घटकर 38.2% रह गया।
जंगीपुर : बड़ा राजनीतिक बदलाव
जंगीपुर में, जहाँ मुस्लिम मतदाता 56% हैं, भाजपा का वोट प्रतिशत 22.17% से बढ़कर 42.90% हो गया। पार्टी को लगभग 47 हजार अतिरिक्त वोट मिले, जबकि टीएमसी का वोट शेयर 68.82% से गिरकर 37.94% रह गया। कांग्रेस को 14.69% वोट मिले, जो मुख्यतः उन मुस्लिम मतदाताओं से आए जो पहले टीएमसी के साथ थे।
बेलडांगा : मुस्लिम वोटों का बिखराव
63% मुस्लिम आबादी वाली बेलडांगा सीट पर भाजपा का वोट प्रतिशत मामूली रूप से 28.86% से बढ़कर 31.88% हुआ। लेकिन टीएमसी 55.19% से गिरकर 26.10% पर आ गई। आम जनता उन्नयन पार्टी को 20.43% और कांग्रेस को 17.48% वोट मिले। यह स्पष्ट संकेत था कि टीएमसी से दूर हुआ मुस्लिम वोट सीधे भाजपा की ओर नहीं गया, बल्कि अन्य दलों में विभाजित हुआ।
कांडी और नबाग्राम में भी समान रुझान
कांडी सीट पर भाजपा को 36.78%, टीएमसी को 31.60%, कांग्रेस को 15.62% और AIMIM को 11.52% वोट मिले। कांग्रेस और AIMIM को मिला लगभग 27% वोट टीएमसी से अलग हुए मुस्लिम वोटों का प्रतिनिधित्व करता था।
नबाग्राम में भाजपा 31.14% से बढ़कर 35.54% पर पहुँची, जबकि टीएमसी 48.18% से गिरकर 32.86% रह गई। कांग्रेस 22.63% तक पहुँच गई, जो स्पष्ट रूप से मुस्लिम मतदाताओं के झुकाव को दर्शाता है।
मुर्शिदाबाद में बड़ा उलटफेर
मुर्शिदाबाद जिले में भाजपा ने 22 में से 9 सीटें जीत लीं, जबकि 2021 में उसके पास केवल 2 सीटें थीं। दूसरी ओर टीएमसी 20 सीटों से घटकर केवल 9 सीटों पर सिमट गई।
क्या पसमांदा मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया?
विश्लेषण के अनुसार इसका सीधा उत्तर “नहीं” है। उपलब्ध आंकड़ों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला कि बड़ी संख्या में मुसलमान सीधे भाजपा के पक्ष में गए हों। बेलडांगा जैसे क्षेत्रों में टीएमसी से दूर हुआ मुस्लिम वोट मुख्य रूप से कांग्रेस, AIMIM और क्षेत्रीय दलों के पास गया।
इसका अर्थ यह नहीं कि बदलाव महत्वहीन था। बल्कि इसका असली संदेश और भी गहरा है। बंगाल 2026 में पसमांदा मुसलमानों का राजनीतिक संदेश यह नहीं था कि “हम भाजपा को चुनते हैं”, बल्कि यह था कि “हम किसी एक दल की स्थायी संपत्ति नहीं हैं।”
मुस्लिम वोट कांग्रेस, AIMIM, आम जनता उन्नयन पार्टी और वाम दलों के बीच बँट गया। यह एक सचेत लोकतांत्रिक संदेश था कि पसमांदा समुदाय अब अपने हित, शिकायत और आकांक्षाओं के आधार पर वोट करेगा, न कि तथाकथित सामुदायिक ठेकेदारों के निर्देश पर।
बहुकोणीय मुकाबले का असर
तीन-कोणीय मुकाबले में जीत के लिए लगभग 33% वोट पर्याप्त होते हैं, जबकि चार-कोणीय मुकाबले में 28-29% वोट पर भी जीत संभव हो जाती है।
पसमांदा मुसलमानों ने टीएमसी को एकजुट होकर वोट नहीं दिया। इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने भाजपा को वोट दिया, लेकिन टीएमसी की “स्थायी वोट बैंक” राजनीति को अस्वीकार कर उन्होंने भाजपा की जीत का रास्ता आसान कर दिया।
राष्ट्रीय स्तर पर बदलता रुझान
यह बदलाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में 2017 तक सामान्य मुसलमानों में भाजपा का समर्थन 12.6% और पसमांदा मुसलमानों में 8% था। 2022 तक सामान्य मुसलमानों में भाजपा समर्थन घटकर 9.8% रह गया, जबकि पसमांदा मुसलमानों में यह बढ़कर 9.1% हो गया।
सीएसडीएस-लोकनीति नेटवर्क के शोध के अनुसार गरीब मुस्लिम तबकों तक पहुँचने की भाजपा की रणनीति ने गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों में मुस्लिम वोट शेयर बढ़ाने में मदद की।
2024 लोकसभा चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षणों में भी यह सामने आया कि मुस्लिम वोटिंग व्यवहार अब केवल धार्मिक पहचान पर आधारित नहीं रह गया है, बल्कि उपजाति, सामाजिक वर्ग, शिक्षा और आर्थिक हितों के आधार पर भी प्रभावित हो रहा है।
यह बदलाव भारतीय मुस्लिम राजनीति और उन सभी दलों के लिए बड़ा संदेश है, जिन्होंने अब तक मुस्लिम समाज को एक समान और स्थायी वोट बैंक मानकर राजनीति की है।
(Shariq Adeeb- National working President)

