मेरा सदैव से मानना रहा है कि भारत के मुसलमानों का सबसे अधिक नुकसान , किसी नेहरू, किसी राजीव, किसी नरसिंहराव , किसी बाजपेयी आडवाणी या किसी मोदी ने नहीं बल्कि उसके बीच के ही एक”मुहम्मद अली जिन्ना” ने किया था जो अविभाज्य भारत के मुसलमानों को तीन हिस्सों में बाँट दिया वर्ना इसी अविभाज्य भारत में मुसलमानों की संख्या 60 करोड़ की होती और इसी अविभाज्य भारत में सत्ता की चाभी उनके हाथ में होती।
किसी समूह या वर्ग को कमज़ोर करना हो तो , बहुत सीधा सा फार्मुला है कि उसे बाँट दो , जैसे 1947 में उस अविभाज्य भारत के मुसलमान 3 हिस्सों में बंट गये।
यह साजिश केवल मुहम्मद अली जिन्ना की नहीं थी , वह तो एक मोहरा या कंधा थे, इसकी सबसे पहले शुरुआत सावरकर ने की और द्वीराष्ट्र का सिद्धांत दिया मगर जिन्ना के कंधे पर बंदूख रख कर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और भारत के नेहरू-पटेल ने गोली चलाई।
मुहम्मद अली जिन्ना की सबसे बड़ी गलती इसलिए थी कि लंदन में पढ़े उस समय के सबसे बड़े बैरिस्टर को यह बात समझ में नहीं आई कि कौम बांटने से कमज़ोर हो जाती है और वह भारत में बंटवारे की साज़िश का कंधा बन गये और भारत में रह रहे मुसलमानों के लिए हमेशा के लिए मुश्किलें खड़ी कर गये।
बैरिस्टर मुहम्मद अली जिन्ना भी मात्र 19 साल की उम्र में इंग्लैंड से वकालत पढ़ कर आए एक सभ्रांत और रईस परिवार से थे , जैसे सभ्रांत परिवार में जन्में ओवैसी ने भी लंदन में ही वकालत की पढ़ाई की और कम उम्र में ही बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त कर ली।
जिन्ना की तरह ओवैसी को भी कानून का प्रंचंड ज्ञान है। जिन्ना भी तब की काँग्रेस की गोद में ही पले बढ़े और ओवैसी के तो बाप दादा तक काँग्रेस की गोद में पले बढ़े। जिन्ना भी ऐश्वर्य जीवन जीते थे तो असदुद्दीन ओवैसी भी बंजारा हिल के ₹400 करोड़ की हवेली में रहते हैं जो उनको 2014 के चुनाव के बाद मिली।
भारतीय राजनीति में मुहम्मद अली जिन्ना का उदय 1916 में कांग्रेस के एक नेता के रूप में हुआ था, जो शुरुआत में हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए काकोरी कांड के स्वतंत्रता सेनानियों से लेकर बाल गंगाधर तिलक तक का मुकदमा लड़ते थे।
पर बाद में भारतीय मुसलमानों के प्रति कांग्रेस के उदासीन रवैये को देखते हुए जिन्ना ने कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने देश में मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा और स्वशासन के लिए चौदह सूत्रीय संवैधानिक सुधार का प्रस्ताव रखा जैसे आज ओवैसी कयादत और भागीदारी की बात करते हैं..ओवैसी और उनकी पार्टी इस मामले में बिल्कुल समान है।
1947 में “आपरेशन पोलो” में हारने के बाद निजाम हैदराबाद की “रज़ाकार सेना” के मुखिया कासिम रिज़वी सरदार पटेल द्वारा दिए प्रस्ताव को स्वीकार करके पाकिस्तान भाग गया,और मौलाना अब्दुल वाहेद ओवैसी ने उसके संगठन “एमआईएम” का नेतृत्व संभाला।
अब्दुल वाहेद ओवैसी को नफरत फैलाने के लिए तब की सरकार ने 11 महीने तक जेल में रखा। अब्दुल वाहेद ओवैसी को 14 मार्च 1958 को गिरफ्तार किया गया था। वाहेद पर हैदराबाद पुलिस ने सांप्रदायिक सद्भावना को भंग करने, मजहबी नफरत फैलाने, स्टेट और देश के खिलाफ मुसलमानों को भड़काने के आरोप तय किए थे।
अब्दुल वाहेद ओवैसी ने 1957 में लगातार 5, 12, 23 और 24 अक्टूबर को नफरत फैलाने वाला भाषण दिया था। इसके बाद 9 जनवरी 1958 को भी वाहेद ने नफरत का जहर उगला था जिसके बाद तत्कालीन सरकार ने उनको सांप्रदायिक नफरत फैलाने के आरोप में जेल में बंद कर दिया।
अब्दुल वाहेद ओवैसी , सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी के वालिद और असदुद्दीन ओवैसी के दादा थे। पर सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी ने जब 1960 को हैदराबाद से अपना पहला चुनाव जीते तो सीधे जाकर काँग्रेस की गोद में बैठ गये और उनके बाद उनके दोनों पुत्रों ने भी 2012 तक काँग्रेस की गोद में बैठकर मलाई खाई , कांग्रेस की दरी बिछाई और देश में मुसलमानों के हुए तमाम कत्लेआम मेरठ , मलियाना, मुरादाबाद, हाशिमपुरा , गुजरात 2002 , मुंबई दंगा , इलाहाबाद, वाराणसी, भागलपुर, किशनगंज और 6 दिसंबर बाबरी मस्जिद तक जब-तक कांग्रेस की सत्ता रही चूं नहीं बोले और केंद्र और अपने राज्य में कांग्रेस की दरी बिछाते रहे….
पिछले 60 साल में कांग्रेस की दरी बिछाते हुए ओवैसी खानदान ने ₹10 हज़ार करोड़ की संपत्ती बनाई , वक्फ़ ज़मीनों पर कब्ज़ा करके हाउसिंग सोसायटी के टावर बनाए , उन्हें बेचा , मेडिकल कॉलेज बनाए , दारुस्सलाम बैंक बनाकर सूदखोरी करते रहे और उसके बाद भारतीय मुसलमानों के प्रति कांग्रेस के रवैये को देखते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने 2012 में कांग्रेस का साथ छोड़ दिया।
हालांकि 2004 के बाद ना कोई मेरठ हुआ ना मलियाना ना मुरादाबाद, हाशिमपुरा , गुजरात 2002 , मुंबई दंगा , इलाहाबाद, वाराणसी, भागलपुर, किशनगंज और ना 6 दिसंबर बाबरी मस्जिद मगर वह समझ गये कि अब कांग्रेस सत्ता से जाने वाली है…
ऐसे ही जिन्ना ने भी कांग्रेस पर आरोप लगाकर उसका साथ छोड़ा था जब पता चला कि ब्रिटिश हुकूमत जाने वाली है, और मुसलमानों को बांटने के लिए वह ब्रिटिश हुकूमत की गोद में बैठ गये।
जिन्ना की तरह असदुद्दीन ओवैसी ने भी कभी संघर्ष और आंदोलन की राजनीति नहीं की , ना कभी किसी प्रोटेस्ट का दोनों ने नेतृत्व किया ना कभी किसी धरने प्रदर्शन में हिस्सा लिया और ना कभी सड़क पर उतर कर आंदोलन किया या किसी जनआंदोलन में जेल गये ना पुलिस की लाठी खाए…
दंगें तब भी हुए , 1924 में वर्तमान पाकिस्तान के कोहाट में भीषण दंगा हुआ, 1927 में नागपुर में हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच हिंसा भड़की मगर मुहम्मद अली जिन्ना ने दंगा पीड़ित मुसलमानों के ज़ख्मों पर मरहम लगाने उनके घरों को गये हों ऐसा उदाहरण नहीं मिलता मगर महात्मा गांधी ज़रूर मौजूद रहते थे, हरियाणा से पश्चिम बंगाल तक.. दंगाईयों को रोकते थे , उन्हें रोकने के लिए उसी दंगा क्षेत्र में अनसन करते थे।
मगर जिन्ना की तरह यह सब किसी ओवैसी ने नहीं किया, ना किसी एकलाख, ना किसी पहलू खान ना किसी जुनैद, तबरेज़ के मां बाप के आंसू पोंछे, कहने को ओवैसी के पास 10 हज़ार करोड़ की संपत्ति है मगर दिल चूहे का है।
आज़ादी की लड़ाई में तब के जब सभी नेता जेल जा रहे थे , मुहम्मद अली जिन्ना ही वह शख्स थे जो एक दिन के लिए भी कभी जेल नहीं गये। असदुद्दीन ओवैसी भी कभी जनआंदोलन में जेल नहीं गये , देश में शाहीन बाग आंदोलन चला और ओवैसी चार कदम दूर लुटियंस जोन में बैठे रहे।
इसके बाद जबकि पिछले 10-11 सालों से इस देश में मुसलमान गाय , राम , मस्जिद, कोरोना के नाम पर आक्रमण पर था, ओवैसी ना किसी पीड़ित के घर जाते हैं ना किसी पीड़ित के लिए आंदोलन करते हैं , बस ट्विटर पर ट्वीट या टेलीविजन पर बोल कर खिसक जाते रहे।
बिल्कुल जिन्ना की तरह , जिन्ना भी यही करता था, जिन्ना की तरह ओवैसी भी भड़काऊ भाषण देने में माहिर हैं। तब जिन्ना ने मुसलमानों को तीन हिस्सों में बाँट दिया , अब ओवैसी मुसलमानों को राजनीतिक रूप से हर चुनाव में बाँटने आते रहे हैं।
इस देश में मुसलमान सदैव से जिस भी पार्टी के साथ रहा एक साथ साथ रहा , 1989 तक काऊ बेल्ट में यदि काँग्रेस के साथ रहा तो शेष राज्यों में आज भी वह काँग्रेस के साथ है।
1989 के बाद वह वीपी सिंह , मुलायम सिंह यादव के साथ रहा तो अखिलेश यादव के साथ आजतक है। एक साथ मुत्तहिद होकर वह अपने लिए कम ज़ालिम सरकार बनाने में मदद करता रहा है जो भले उसे नौकरी ना दे, रोजगार ना दे, दंगे में उसे सुरक्षा ना दे मगर उसकी मस्जिद, मदरसे कब्रिस्तान, उसके रोज़ा नमाज़ और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप ना करे और सरकारें ऐसा ही करती आईं हैं….
असदुद्दीन ओवैसी , भाजपा विरोधी इस साॅलिड वोट को बिखेर कर मुसलमानों के ऊपर हर राज्य में और ज़ालिम हुकूमत मुसल्लत कर देना चाहते हैं जो उनकी मस्जिद, उनके कब्रिस्तान , उनके मदरसे और उनके धार्मिक स्वतंत्रता पर आक्रमण करें…
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और आसाम की तरह। और खुद कभी किरन रेड्डी , कभी केसीआर और कभी रेवंत रेड्डी की सुरक्षित छत्रछाया में सुकून से रहें।
उनको वहाँ भागीदारी नहीं चाहिए , वहां कयादत नहीं चाहिए और तेलंगाना की 119 विधानसभा में उनको आठवीं सीट भी नहीं चाहिए , बाकी जगह भागीदारी और कयादत के नाम पर हर सीट पर वह चुनाव लड़ेंगे और भाजपा से लड़ने वाले दलों को ब्लैकमेल करेंगे.. यही जिन्ना ने किया था।
बंटवारे में देश के सारे क्रीमी लेयर लेकर पाकिस्तान चला गया और भारत में रह गये नंगे भूखे गरीब मुसलमान…
बंटवारे की राजनीति जो जिन्ना ने की उसी को भारत का आज का मुसलमान भोग रहा है। और मुसलमानों को बांटने की वही राजनीति आज ओवैसी कर रहे हैं।
ओवैसी के समर्थक या तो दूध का दाँत टूटते ही हाथ में स्मार्टफोन पाने वाले लोग हैं या मदरसा से निकले या पढ़ रहे तालीब ए इल्म या मुस्लिम मुहल्ले से कभी नहीं निकलने वाले जमूरे या गल्फ देशों में बैठकर पेट्रो डाॅलर कमा रहे लोग।
ऐसे लोग 1% भी नहीं पर ऐसे लोग देश के 99% मुसलमानों को उन हिंदुओं के शक के दायरे में खड़ा कर रहे हैं जो ओवैसी के नाम पर भाजपा के पक्ष में ध्रुविकरण कर लेते हैं।
यह 99% मुसलमान इसी देश में बहुसंख्यकों के साथ मिल कर रोज़ी रोटी कमाते हैं , अपना परिवार चलाते हैं , वह ओवैसी की अलगाववादी विचारधारा के समर्थक ना होते हुए भी केवल मुसलमान होने के नाते हिंदुओं के शक के दायरे में आते हैं और इससे ऐसे मुसलमानों के व्यापार रोज़गार पर असर पड़ता है।
देश के आज के माहौल में जहाँ किसी व्यक्ति की राजनैतिक विचारधारा की पहचान ही किसी काम का आधार हो वह मुसलमानों के लिए वैसी ही मुश्किल है जैसे जिन्ना ने 1947 में देश के मुसलमानों के लिए पैदा की थी। यही कारण है कि भारत की भगवा मीडिया ओवैसी को हाईलाईट करती है।
बिहार के मुसलमानों को यह साजिश समझनी चाहिए , उनका ओवैसी को समर्थन करना बहुसंख्यकों के साथ उनके हर संबन्धों को खराब कर देने की एक साजिश है।
संघ और मीडिया इसीलिए ओवैसी ओवैसी करता है , यह विभाजनकारी राजनीति वर्तमान में जिन्ना और जिन्ना की राजनीति का मौजूदा रूप है , जिसकी मार भारत का मुसलमान पिछले 73 सालों से खा रहा है।
जिन्ना ने भी अपनी विभाजन की राजनीति “कयादत” और “हिस्सेदारी” के नाम पर ही की , यदि वह 1947 में पाकिस्तान का “कायदे आजम” ना बनकर भारत में मुसलमानों का “अंबेडकर” बनता तो आज भारत में मुसलमान सबसे अधिक मजबूत होते… मगर कमज़ोर कर गया
वही आज असदुद्दीन ओवैसी कर रहे हैं… “मुसलमान सावधान”

