पसमांदगी से निकलने का रास्ता तालीम और इत्तेहाद – मौलाना अब्दुर रकीब रहमानी

खुद को बदलो, हालात बदलेंगे,पसमांदा समाज को मौलाना रहमानी का मजबूत संदेश

इल्म ही तरक्की की कुंजी – मौलाना अब्दुर रकीब रहमानी

गाज़ियाबाद / जामताड़ा।  साहिबाबाद स्थित मदरसा अनवार ए शराफ़त, गरिमा गार्डन की जामा मस्जिद में आज जुमा की नमाज़ के अवसर पर एक बेहद अहम और विचारोत्तेजक तकरीर पेश किया गया। तकरीर मौलाना अब्दुर रकीब रहमानी (अंसारी), राष्ट्रीय प्रवक्ता, ऑल इंडिया पसमांदा उलेमा बोर्ड द्वारा दिया गया, जिसका विषय था “पसमांदगी से निकलने के रास्ते”
मौलाना रहमानी ने अपने ख़िताब में पसमांदा समाज की मौजूदा हालत पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पसमांदगी सिर्फ आर्थिक कमजोरी नहीं, बल्कि तालीम, रोजगार, सामाजिक पहचान और हक़ की आवाज़ से दूरी का नाम है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक समाज खुद अपनी हालत बदलने का इरादा नहीं करेगा, तब तक कोई बाहरी ताकत उसे आगे नहीं बढ़ा सकती।
उन्होंने पसमांदगी की प्रमुख वजहों पर रोशनी डालते हुए तालीम से दूरी, आपसी तफरका, सियासी बेदारी की कमी और आर्थिक पिछड़ापन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कुरान की पहली वह्यी “इक़रा” (पढ़ो) का हवाला देते हुए कहा कि इल्म ही तरक्की की असली कुंजी है।
अपने संबोधन में उन्होंने इस्लाम के उस मूल संदेश को भी दोहराया जिसमें बराबरी और इंसाफ की शिक्षा दी गई है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में किसी भी तरह की ऊंच-नीच की कोई जगह नहीं है, और अगर समाज पीछे है तो उसकी वजह हमारे अपने अमल हैं, न कि दीन की शिक्षाएं।
मौलाना रहमानी ने पसमांदगी से निकलने के लिए ठोस उपाय भी सुझाए, जिनमें सबसे ज्यादा जोर तालीम पर दिया गया। उन्होंने कहा कि हर घर से कम से कम एक बच्चे को उच्च शिक्षा दिलाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है, और बेटियों की तालीम को नजरअंदाज करना समाज के भविष्य के साथ अन्याय है।
उन्होंने नौजवानों को खास तौर पर संबोधित करते हुए कहा कि वे मोबाइल और सोशल मीडिया में समय बर्बाद करने के बजाय अपनी ऊर्जा को शिक्षा, हुनर और आत्मनिर्भरता की ओर लगाएं। साथ ही उन्होंने छोटे कारोबार, तकनीकी कौशल और आत्मरोजगार को अपनाने की अपील की।
खुतबे में सामाजिक एकता पर भी विशेष जोर दिया गया। मौलाना ने कहा कि बिरादरी और जाति के नाम पर बंटा समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता, इसलिए “मैं” की सोच छोड़कर “हम” की भावना को अपनाना होगा।
सियासी जागरूकता को जरूरी बताते हुए उन्होंने कहा कि समाज को अपने हक़ और प्रतिनिधित्व के लिए सजग होना होगा, और पढ़े-लिखे नेतृत्व को आगे लाना होगा।
इसके अलावा उन्होंने दहेज, फिजूल खर्ची जैसी सामाजिक बुराइयों को खत्म करने और सादगी को अपनाने की भी जोरदार अपील की।
तकरीर के अंत में मौलाना रहमानी ने दुआ करते हुए अल्लाह से कौम की पसमांदगी दूर करने, इल्म, अमल और एकता प्रदान करने तथा नौजवानों को सही रास्ते पर चलने की तौफीक देने की दुआ की।
यह खुतबा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सुधार का एक मजबूत संदेश भी बनकर सामने आया, जिसने उपस्थित नमाजियों के दिलों पर गहरा असर छोड़ा।