राजनीति में मुसलमानों की सकारात्मक भागीदारी समय की अहम जरूरत : मौलाना अब्दुल रकीब रहमानी

जामताड़ा : ऑल इंडिया पसमांदा उलेमा बोर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता मौलाना अब्दुल रकीब रहमानी ने कहा है कि वर्तमान दौर केवल राजनीतिक बदलाव का नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन, नैतिक पतन और प्रतिनिधित्व के संकट का भी दौर है। ऐसे हालात में मुसलमानों सहित सभी कमजोर और वंचित तबकों के लिए लोकतांत्रिक राजनीति में सकारात्मक और जिम्मेदार भागीदारी समय की अहम जरूरत बन चुकी है।
उन्होंने अपने एक लिखित बयान में कहा कि चुनाव, मतदान और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी को केवल दुनियावी मामला समझना सही नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, नागरिक अधिकारों और सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण दायित्व है। उनके अनुसार आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में राजनीतिक भागीदारी से दूरी कमजोर तबकों को और अधिक हाशिये पर धकेल सकती है।
मौलाना रहमानी ने कहा कि भले ही आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था और पारंपरिक इस्लामी शासन व्यवस्था पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं, लेकिन लोकतंत्र के कई बुनियादी सिद्धांत जैसे परामर्श, जवाबदेही, न्याय और जनकल्याण इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप हैं। उन्होंने कहा कि कुरआन का सिद्धांत सामूहिक मामलों में आपसी मशवरे और भागीदारी की शिक्षा देता है।
उन्होंने आगे कहा कि इस्लाम केवल इबादत तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव समाज में न्याय, दया और सामाजिक संतुलन कायम करने पर भी जोर देता है। इस्लामी शिक्षाएं जान, माल, सम्मान, बुद्धि और धर्म की सुरक्षा को विशेष महत्व देती हैं, इसलिए उन कानूनों और नीतियों पर नजर रखना जरूरी है जो लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं।
मौलाना अब्दुल रकीब रहमानी ने कहा कि इस्लामी इतिहास में सामाजिक और राजनीतिक मामलों से पूरी तरह अलग-थलग रहने को कभी आदर्श व्यवहार नहीं माना गया। पैगंबर हजरत मोहम्मद ﷺ ने मदीना में विभिन्न समुदायों के बीच आपसी अधिकारों, समझौतों और सामूहिक जिम्मेदारियों पर आधारित एक आदर्श समाज की स्थापना की थी। बाद के दौर में भी उलेमा और सूफियों ने समाज सुधार और जनहित के मुद्दों पर शासकों से संवाद और मार्गदर्शन का रास्ता अपनाया।
उन्होंने मतदान को एक नैतिक गवाही बताते हुए कहा कि वोट के जरिए नागरिक यह तय करता है कि समाज किस दिशा में जाएगा। इसलिए न्याय, ईमानदारी और मानवीय गरिमा के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों और नीतियों का समर्थन जरूरी है, जबकि अन्याय, नफरत और भेदभाव की राजनीति पर चुप्पी सामाजिक नुकसान का कारण बन सकती है।
मौलाना रहमानी ने कहा कि इस्लाम संतुलन, संवाद और सामाजिक सौहार्द की शिक्षा देता है। वर्तमान समय में बढ़ती नफरत और वैचारिक कट्टरता के माहौल में जरूरी है कि धार्मिक और नैतिक मूल्यों से जुड़े लोग रचनात्मक भूमिका निभाएं, ताकि राजनीति केवल सत्ता संघर्ष का माध्यम न रहकर जनकल्याण और सामाजिक न्याय का जरिया बन सके।
उन्होंने अंत में कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में सकारात्मक भागीदारी वास्तव में न्याय, मानवता और सामूहिक जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है तथा समाज में शांति, समानता और भाईचारे की स्थापना के लिए यह भूमिका बेहद आवश्यक है