असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी AIMIM जब भी तेलंगाना और हैदराबाद से बाहर जाकर चुनाव प्रचार करती है, तो उनका एक ही एजेंडा होता है। वे कहते हैं कि हमने अपनी सरज़मीं पर मुसलमानों के लिए बहुत काम किया है। वे खुद को पूरे देश के मुसलमानों का सबसे बड़ा हमदर्द और रहनुमा बताकर वोट मांगते हैं।
लेकिन जब हम तेलंगाना की ज़मीनी हकीकत देखते हैं और तेलंगाना सरकार की *जी. सुधीर कमीशन रिपोर्ट 2016* को पढ़ते हैं, तो उनके दावों और हकीकत में बहुत बड़ा फर्क दिखता है।
गरीबी का सच- रिपोर्ट के अनुसार तेलंगाना में 80% से 85% मुस्लिम आबादी आज भी बेहद पिछड़ी और गरीब हालत में जी रही है। राज्य के लगभग 48% मुस्लिम परिवारों की कुल महीने की आय 10,000 रुपये से भी कम है। दशकों से हैदराबाद की राजनीति ओवैसी परिवार के हाथ में होने के बावजूद, आम मुसलमान और खासकर 85% पसमांदा समाज की आर्थिक स्थिति नहीं सुधर पाई।
नौकरी और भागीदारी में पीछे- ओवैसी साहब यूपी और बिहार में जाकर भागीदारी की बात करते हैं, लेकिन अपनी ही रियासत तेलंगाना में मुसलमानों की स्थिति पर चुप रहते हैं। राज्य की आबादी में मुसलमान 12.68% हैं, लेकिन सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 7.36% है। पुलिस, प्रशासन और तकनीकी विभागों में तो यह संख्या और भी कम है। जो नेता अपनी रियासत में ही पसमांदा को उनका हक नहीं दिला पाया, वो दूसरे राज्यों में नुमाइंदगी का दावा कैसे कर सकता है?
तालीम और रोज़गार से दूरी- किसी भी समाज की तरक्की की पहली सीढ़ी शिक्षा है। सुधीर कमीशन की रिपोर्ट बताती है कि तेलंगाना में मुस्लिम बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर राज्य के औसत से दोगुनी है। ज्यादातर पसमांदा आज भी मजदूरी, दस्तकारी, ऑटो चलाने और छोटे-मोटे कामों पर निर्भर हैं। युवाओं के पास न अच्छी शिक्षा है, न अच्छे रोज़गार।
निष्कर्ष- सुधीर कमीशन की रिपोर्ट ने उस तिलिस्म को तोड़ दिया है जिसमें ओवैसी साहब हैदराबाद को विकास का मॉडल बताते हैं। मंच पर जोशीले भाषण देना आसान है, लेकिन असली नेतृत्व वो है जो समाज को शिक्षा, रोज़गार और आर्थिक मजबूती दे। 85% पसमांदा समाज अब समझ चुका है कि सिर्फ नारों से घर नहीं चलता। अब समाज रिपोर्ट और आंकड़ों के आधार पर अपना फैसला करेगा।

